छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले में पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा एक साल से ज्यादा समय बाद आखिरकार जेल से बाहर आ गए। 379 दिन बाद जैसे ही वे रायपुर सेंट्रल जेल के गेट से निकले, कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने फूल-मालाओं से उनका स्वागत किया। जेल रोड पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी, हालात ऐसे बने कि लंबा जाम लग गया और कुछ देर के लिए आवाजाही ठप सी हो गई।
जेल से बाहर आते ही कवासी लखमा कांग्रेस नेता गिरीश देवांगन से गले मिले, इसके बाद उन्होंने महात्मा गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। इस मौके पर उनके बेटे हरीश लखमा, विधायक विक्रम मंडावी, सावित्री मंडावी, पूर्व विधायक विकास उपाध्याय सहित कांग्रेस के कई नेता और कार्यकर्ता मौजूद रहे। लखमा समर्थकों के साथ गाड़ी की बोनट पर खड़े होकर अभिवादन करते नजर आए, जिससे माहौल पूरी तरह राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन में बदल गया।
रिहाई के बाद लखमा ने कहा कि वे सबसे पहले देश की न्यायपालिका और सुप्रीम कोर्ट का आभार व्यक्त करते हैं। उन्होंने खुद को “एक गरीब आदिवासी और बस्तर की आवाज” बताते हुए कहा कि उनका न्याय व्यवस्था पर भरोसा और मजबूत हुआ है। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज, चरणदास महंत और टी.एस. सिंहदेव का भी खुलकर धन्यवाद किया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कवासी लखमा ने छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री अरुण साव का सार्वजनिक रूप से आभार जताया। उन्होंने कहा कि जेल में रहते हुए उन्होंने टीवी और अखबारों में देखा कि अरुण साव ने उनके समर्थन में बयान दिए, जिसके लिए वे दिल से धन्यवाद करते हैं। लखमा ने यह भी कहा कि वे जब तक राजनीति में रहेंगे, बस्तर के जल-जंगल-जमीन की लड़ाई लड़ते रहेंगे।
वहीं भाजपा की ओर से इस रिहाई पर तंज भी कसा गया। भाजपा नेताओं ने कहा कि कवासी लखमा जमानत पर रिहा हुए हैं और कांग्रेस के बड़े चेहरे—न भूपेश बघेल, न दीपक बैज, न चरणदास महंत और न ही टीएस सिंहदेव—कोई भी उन्हें लेने जेल नहीं पहुंचा। भाजपा ने इसे कांग्रेस के भीतर लखमा के “घटते कद” से जोड़कर देखा।
इस बीच कवासी लखमा की पत्नी बुधरी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि रिहाई की अनिश्चितता ने उनके पति को अंदर से तोड़ दिया था। लगातार चिंता के कारण वे दुबले-पतले हो गए थे और खाना-पीना कम कर दिया था। अब जेल से बाहर आने के बाद परिवार को राहत महसूस हो रही है।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट से कवासी लखमा को बड़ी राहत मिली है। प्रवर्तन निदेशालय और EOW से जुड़े मामलों में उन्हें अंतरिम जमानत दी गई है। हालांकि जमानत की शर्तें सख्त हैं—उन्हें छत्तीसगढ़ से बाहर रहना होगा, पासपोर्ट जमा करना होगा और अपना पता व मोबाइल नंबर संबंधित थाने में दर्ज कराना अनिवार्य है। कोर्ट में पेशी के लिए ही वे राज्य में आ सकेंगे।
तीन महीने पहले सुप्रीम कोर्ट ने ED को कड़ी फटकार भी लगाई थी। अदालत ने पूछा था कि जांच आखिर कितने समय तक चलेगी और अब तक कौन-सी ऐसी जांच बची है जो पूरी नहीं हो पाई। कोर्ट ने ED अधिकारियों से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया था।
ED का आरोप है कि कवासी लखमा शराब सिंडिकेट के अहम हिस्से थे और उनके निर्देश पर ही पूरा नेटवर्क काम करता था। एजेंसी के मुताबिक लखमा को हर महीने करीब 2 करोड़ रुपये कमीशन के रूप में मिलते थे और तीन साल में यह रकम 72 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। इस पैसे से उनके बेटे का मकान और सुकमा में कांग्रेस भवन का निर्माण कराया गया। जांच एजेंसियों का दावा है कि इस पूरे घोटाले से राज्य को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
कुल मिलाकर, कवासी लखमा की रिहाई सिर्फ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक नया अध्याय खोलती दिख रही है। जहां एक तरफ कांग्रेस इसे न्याय की जीत बता रही है, वहीं दूसरी ओर भाजपा इसे जमानत और आरोपों से जोड़कर देख रही है। आने वाले दिनों में यह मामला सियासी तौर पर और कितना गरमाता है, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।