दांतों में महंगाई का दर्द: सोना इतिहास बना, चांदी की फिलिंग चार गुना महंगी, सरकारी अस्पताल में राहत

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सोने–चांदी की बढ़ती कीमतों का असर अब जेवरात तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दांतों के इलाज पर भी इसका सीधा असर दिखने लगा है। दंत चिकित्सा में लंबे समय से इस्तेमाल होने वाली चांदी की फिलिंग अब आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही है। पहले जहां एक दांत में चांदी भरवाने का खर्च उसके आकार के हिसाब से करीब 500 से 700 रुपये तक आता था, वहीं अब यही खर्च बढ़कर 2,000 से 2,800 रुपये तक पहुंच गया है। यानी दांतों की फिलिंग भी अब चार गुना महंगी हो चुकी है।

कीमतों में आई इस तेजी के बाद दंत चिकित्सकों को भी विकल्पों की ओर रुख करना पड़ रहा है। चांदी की जगह अब मिश्रित धातुओं का ज्यादा इस्तेमाल होने लगा है, जबकि सोने की जगह कास्ट मेटल को तरजीह दी जा रही है। इन कास्ट मटेरियल्स में सिल्वर और कास्ट गोल्ड का मिश्रण होता है, वहीं मजबूती और टिकाऊपन के लिए सेरेमिक मटेरियल का भी सहारा लिया जा रहा है। इलाज तकनीकी रूप से आधुनिक जरूर हुआ है, लेकिन लागत ने मरीजों की जेब पर दबाव बढ़ा दिया है।

हालांकि इस महंगाई के बीच सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों के लिए राहत की खबर है। राजधानी के शासकीय दंत महाविद्यालय एवं चिकित्सालय के प्राचार्य डॉ. वीरेंद्र वाढेर के अनुसार, सोने-चांदी के दाम बढ़ने से दांतों का इलाज जरूर महंगा हुआ है, लेकिन सरकारी दंत चिकित्सालय में इसका असर फिलहाल नहीं पड़ा है। उन्होंने बताया कि चांदी के दाम बढ़ने से पहले ही सालभर का स्टॉक खरीद लिया गया था, इसलिए सरकारी अस्पताल इस महंगाई से फिलहाल अप्रभावित हैं।

निजी दंत चिकित्सालयों में इलाज कराने वाले मरीजों को अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा खर्च उठाना पड़ रहा है। सोना और चांदी ही नहीं, बल्कि अन्य मिश्रित धातुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है। इसके उलट सरकारी दंत चिकित्सालयों में इलाज कराने वाले मरीज सुकून में हैं, क्योंकि यहां फिलहाल दरें जस की तस बनी हुई हैं। राजधानी के शासकीय दंत महाविद्यालय में इलाज के दौरान सोने का प्रयोग नहीं किया जाता, लेकिन केस की जरूरत के अनुसार चांदी की फिलिंग की जाती है, और वह भी पुराने स्टॉक से।

एक समय था जब सड़ा हुआ दांत निकलने के बाद उसकी जगह सोने का दांत लगवाना शान और सामाजिक रुतबे का प्रतीक माना जाता था। लेकिन दंत चिकित्सकों के मुताबिक सोने की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के साथ यह चलन धीरे-धीरे खत्म होता चला गया। लगभग एक दशक पहले से सोने के दांत बनवाने का चलन लगभग बंद हो चुका है। बीते साल तक भी गिने-चुने अपवाद सामने आए थे, लेकिन हाल के महीनों में किसी भी मरीज ने सोने की कैप या दांत लगाने की इच्छा तक जाहिर नहीं की है। इसकी सबसे बड़ी वजह सोने की आसमान छूती कीमतें मानी जा रही हैं।

कुल मिलाकर, महंगाई का असर अब मुस्कान तक पहुंच चुका है। जहां निजी अस्पतालों में दांतों का इलाज आम आदमी के लिए बोझ बनता जा रहा है, वहीं सरकारी दंत चिकित्सालय फिलहाल राहत का ठिकाना बने हुए हैं।

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