ऑनलाइन दुनिया में बच्चों की सुरक्षा को लेकर दावे बहुत किए जाते हैं, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। ऑस्ट्रेलिया की नई eSafety रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि बड़े-बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट को रोकने में अब भी गंभीर रूप से असफल हैं। हैरानी की बात यह है कि टेक्नोलॉजी और टूल्स मौजूद होने के बावजूद शिकायतों में बीते एक साल में 41 प्रतिशत की तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
ऑस्ट्रेलियन सेंटर टू काउंटर चाइल्ड एक्सप्लॉइटेशन के आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में करीब 83 हजार ऑनलाइन चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज से जुड़ी रिपोर्ट दर्ज हुईं। इनमें से ज्यादातर मामले उन्हीं मुख्यधारा के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से जुड़े थे, जिनका दावा है कि वे यूजर्स की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। यह बढ़ता खतरा ऐसे समय में सामने आया है, जब एआई से बने आपत्तिजनक कंटेंट और डीपफेक को लेकर दुनियाभर में चिंता बढ़ रही है और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध तक लगा दिया है।
रिपोर्ट में माना गया है कि कुछ कंपनियों ने शोषण से जुड़े कंटेंट, एआई-जनरेटेड सामग्री और ऑनलाइन ग्रूमिंग की पहचान में आंशिक सुधार किए हैं। उदाहरण के तौर पर, स्नैपचैट की पैरेंट कंपनी Snap ने कार्रवाई का समय 90 मिनट से घटाकर 11 मिनट कर दिया है। माइक्रोसॉफ्ट ने भी Outlook में डिटेक्शन सिस्टम का दायरा बढ़ाया है। इसके बावजूद तस्वीर पूरी तरह संतोषजनक नहीं है।
रिपोर्ट का सबसे गंभीर पहलू यह है कि मेटा और गूगल जैसी दिग्गज कंपनियां अब भी Messenger और Google Meet जैसी वीडियो कॉलिंग सेवाओं पर लाइव-स्ट्रीमिंग के जरिए होने वाले शोषण की प्रभावी निगरानी नहीं कर रही हैं। वहीं, एपल और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय ऑटोमैटिक डिटेक्शन सिस्टम की भारी कमी बताई गई है। एपल आज भी बड़े पैमाने पर यूजर रिपोर्ट पर निर्भर है, जबकि खुद से पहचान करने वाली तकनीकें सीमित हैं।
लाइव वीडियो और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म्स को लेकर चिंता और गहरी हो जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक एपल, डिस्कॉर्ड, गूगल चैट, मीट, माइक्रोसॉफ्ट टीम्स और स्नैप जैसे प्लेटफॉर्म बच्चों से जुड़े सेक्सुअल एक्सटॉर्शन की पहचान के लिए उपलब्ध सॉफ्टवेयर का पूरा इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं। यही वजह है कि शोषण से जुड़ी गतिविधियां कई बार रियल टाइम में पकड़ी ही नहीं जा पातीं।
इन खामियों के बीच ई-सेफ्टी कमिश्नर जूली इनमैन ग्रांट ने साफ शब्दों में कहा है कि अब सिर्फ ट्रांस्पिरेंसी रिपोर्ट से काम नहीं चलेगा। जरूरत ऐसे कड़े कानूनों की है, जो कंपनियों को लॉन्च से पहले ही यह साबित करने के लिए मजबूर करें कि उनके प्लेटफॉर्म बच्चों के लिए सुरक्षित हैं। प्रस्तावित ‘डिजिटल ड्यूटी ऑफ केयर’ कानून के तहत कंपनियों को जोखिम पहले पहचानने, चेतावनी संदेश देने और उपलब्ध सुरक्षा तकनीकों का अनिवार्य रूप से इस्तेमाल करना पड़ सकता है।
रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि पहचान के साथ-साथ रोकथाम और जागरूकता बेहद जरूरी है। रियल-टाइम चेतावनी संदेश और डिटरेंस सिस्टम न सिर्फ गलत गतिविधियों को रोक सकते हैं, बल्कि संभावित पीड़ितों को मदद तक पहुंचने का रास्ता भी दिखा सकते हैं।
ई-सेफ्टी कमिश्नर का कहना है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा कोई वैकल्पिक फीचर नहीं, बल्कि हर डिजिटल प्लेटफॉर्म की बुनियाद होनी चाहिए। टेक्नोलॉजी पहले से मौजूद है, लेकिन कई कंपनियां मुनाफे और यूजर ग्रोथ के दबाव में उसका पूरा इस्तेमाल नहीं कर रहीं। मौजूदा आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि समाधान मौजूद हैं, कमी सिर्फ इच्छाशक्ति और सख्त कार्रवाई की है।