23 साल की उम्र में जॉब की शुरुआत, नई जिम्मेदारियां और लगातार बेचैनी—आज की डिजिटल लाइफ में यह कहानी असामान्य नहीं है। हर समय एंग्जायटी, किसी एक काम पर टिककर फोकस न कर पाना, सुबह उठते ही थकान और दिन खत्म होते-होते घंटों का रील-स्क्रॉल—ये सब सुनते ही दिमाग में एक सवाल उभरता है: क्या यह ADHD है, या फिर मोबाइल की लत?
असल में, ऐसे अनुभवों का बड़ा हिस्सा डिजिटल ओवरलोड से जुड़ा होता है, जिसे एक्सपर्ट्स डिजिटल एरा अटेंशन डेफिसिट सिंड्रोम (DADS) भी कहते हैं। इसमें दिमाग लगातार स्क्रीन से मिल रहे छोटे-छोटे “रिवॉर्ड्स” का आदी हो जाता है। हर नई नोटिफिकेशन, हर रील, हर अपडेट डोपामिन का छोटा-सा बूस्ट देता है। नतीजा यह कि दिमाग हमेशा उत्तेजित रहता है, लेकिन किसी एक काम में टिक नहीं पाता।
यह ADHD से अलग है। ADHD आमतौर पर बचपन से शुरू होने वाली न्यूरोडेवलपमेंटल कंडीशन है—जिसमें पढ़ाई, खेल, रोज़मर्रा की एक्टिविटीज़ में शुरू से ही फोकस की समस्या दिखती है। अगर बचपन में ऐसा कुछ नहीं था और दिक्कतें एडल्ट लाइफ में, खासकर स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बढ़े इस्तेमाल के बाद आई हैं, तो वजह ज़्यादातर डिजिटल ओवरलोड होती है, न कि ADHD।
डिजिटल ओवरलोड का असर सिर्फ फोकस तक सीमित नहीं रहता। धीरे-धीरे नींद खराब होने लगती है, एंग्जायटी बढ़ती है, निर्णय लेना मुश्किल होता है और हर समय ब्रेन-फॉग सा महसूस होता है। रिश्तों में बातचीत सतही हो जाती है और काम पर परफॉर्मेंस गिरने लगती है। यह सिर्फ “आदत” नहीं, बल्कि एक मेंटल हेल्थ रिस्क बन सकता है, अगर समय रहते संभाला न जाए।
दवा का सवाल अक्सर यहीं से उठता है। सच यह है कि डिजिटल ओवरलोड में दवा पहली जरूरत नहीं होती। अगर ADHD का पुख्ता डायग्नोसिस नहीं है, तो स्टिमुलेंट दवाएं उल्टा बेचैनी बढ़ा सकती हैं। ऐसे मामलों में सबसे असरदार तरीका है—डिजिटल आदतों को री-ट्रेन करना और दिमाग को फिर से सिंगल-टास्किंग सिखाना।
चार हफ्तों का एक सरल सेल्फ-हेल्प प्लान काफी मदद कर सकता है। पहले हफ्ते में स्क्रीन टाइम को बस नोटिस करना, सुबह फोन-फ्री रखना और सोने से पहले स्क्रीन बंद करना दिमाग को राहत देता है। दूसरे हफ्ते में सोशल मीडिया की सीमा तय करना और नोटिफिकेशन ऑफ करना जरूरी होता है। तीसरे हफ्ते में 25 मिनट फोकस + 5 मिनट ब्रेक जैसी तकनीक से दिमाग को ट्रेन किया जाता है। चौथे हफ्ते में खुद का री-एसेसमेंट कर यह देखा जाता है कि फोकस, नींद और बेचैनी में कितना फर्क आया।
इसके साथ-साथ कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT) भी कारगर होती है। यह उस डर को चुनौती देती है, जो कहता है—“अगर अभी फोन नहीं देखा तो मैं पीछे रह जाऊंगी।” सोच का यह पैटर्न बदले तो व्यवहार अपने आप बदलने लगता है।
एक्सपर्ट की जरूरत तब पड़ती है, जब स्क्रीन कम करने के बाद भी गंभीर एंग्जायटी, पैनिक अटैक, गहरी उदासी या कामकाज में लगातार गिरावट बनी रहे। ऐसे में प्रोफेशनल एसेसमेंट जरूरी है, ताकि सही कारण और सही इलाज तय हो सके।
निष्कर्ष साफ है—हर टूटता फोकस ADHD नहीं होता। कई बार यह दिमाग की थकान की आवाज़ होती है। थोड़ा रुकना, स्क्रीन से दूरी बनाना, पूरी नींद लेना और माइंडफुलनेस अपनाना—यही सबसे असरदार इलाज है। ध्यान यानी फोकस हमारी सबसे कीमती पूंजी है; इसे बेवजह डिजिटल शोर में खर्च न करें।