छत्तीसगढ़ की राजनीति एक बार फिर राष्ट्रीय मंच पर आ गई है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक चर्चित पॉडकास्ट में दावा किया है कि उन्हें भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने का संकेत दिया गया था। यह बयान उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल के पॉडकास्ट में दिया। बघेल का कहना है कि जब उन्होंने किसी तरह की राजनीतिक प्रतिबद्धता नहीं दी, तो उसके बाद उनके ठिकानों पर लगातार छापेमारी की कार्रवाई शुरू हो गई।
बघेल के अनुसार, उन्हें एक-दो बार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मुलाकात के लिए बुलाया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बातचीत के लिए आमंत्रित किया था। शुरुआत में उन्हें इन बैठकों का उद्देश्य स्पष्ट नहीं हुआ, लेकिन उनका दावा है कि हर मुलाकात के कुछ दिनों बाद उनके खिलाफ जांच एजेंसियों की कार्रवाई तेज हो जाती थी।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि मुलाकातों के दौरान उनसे पूछा जाता था कि उनके खिलाफ कौन-कौन से मामले चल रहे हैं और किस तरह मदद की जा सकती है। उन्होंने कथित तौर पर जवाब दिया कि वे विपक्ष में हैं और सरकार की आलोचना करना उनका राजनीतिक दायित्व है। बघेल का आरोप है कि वे बिना किसी “कमिटमेंट” के लौटते थे और फिर आठ-दस दिन के भीतर छापे की कार्रवाई हो जाती थी।
इसी बीच प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने इस विवाद को और संवेदनशील बना दिया। 18 जुलाई 2025 को ईडी ने शराब घोटाला और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बघेल के बेटे चैतन्य बघेल को गिरफ्तार किया था। एजेंसी का आरोप है कि कथित शराब घोटाले की रकम से 16.70 करोड़ रुपये उन्हें प्राप्त हुए और धन को रियल एस्टेट परियोजनाओं में निवेश किया गया। हालांकि बाद में उन्हें उच्च न्यायालय से जमानत मिल गई।
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले में ईडी और एसीबी की जांच में 3200 करोड़ रुपये से अधिक के कथित घोटाले की बात सामने आई है। जांच एजेंसियों का दावा है कि डिस्टलरी संचालकों से कमीशन, नकली होलोग्राम के जरिए सरकारी दुकानों से बिक्री और सप्लाई जोन में हेरफेर जैसे कई स्तरों पर अनियमितताएं हुईं। पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा, एपी त्रिपाठी और कारोबारी अनवर ढेबर जैसे नाम जांच में सामने आए हैं।
राजनीतिक रूप से यह मामला अब दो समानांतर धाराओं में बह रहा है—एक ओर बघेल का आरोप है कि एजेंसियों की कार्रवाई राजनीतिक दबाव का परिणाम है, दूसरी ओर जांच एजेंसियां इसे वित्तीय अनियमितताओं का संगठित नेटवर्क बता रही हैं। भाजपा की ओर से इन दावों को सिरे से खारिज किया गया है, जबकि कांग्रेस इसे विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश बता रही है।
सवाल अब यह है कि क्या यह केवल आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति है, या आने वाले समय में अदालतों में पेश होने वाले दस्तावेज और साक्ष्य इस पूरे प्रकरण की दिशा तय करेंगे। फिलहाल, छत्तीसगढ़ की सियासत में यह मुद्दा फिर से केंद्र में है और राष्ट्रीय राजनीति की बहस का हिस्सा बन चुका है।