महारत्न कंपनी भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड यानी Bharat Heavy Electricals Limited का ऑफर फॉर सेल खुलते ही बाजार में हलचल तेज हो गई है। केंद्र सरकार अपनी 3% हिस्सेदारी बेच रही है और 2% का ग्रीनशू ऑप्शन भी साथ रखा गया है। पहली नजर में यह मौका आकर्षक लगता है—सरकारी कंपनी, मजबूत ऑर्डर बुक और ब्रोकरेज का ऊंचा टारगेट। लेकिन जैसे-जैसे शेयर की कीमत नीचे आई, कहानी का गणित बदलता दिख रहा है।
सरकार ने ₹254 प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया था। जब ऐलान हुआ, तब बाजार भाव करीब ₹276 था और निवेशकों को लगभग 8% का सीधा डिस्काउंट दिख रहा था। लेकिन ऐलान के बाद शेयर फिसलकर ₹260 के आसपास आ गया। अब डिस्काउंट महज 2-3% रह गया है। यानी जो सौदा पहले “सस्ता” दिख रहा था, वह अब उतना लुभावना नहीं दिखता।
फिर भी तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। ब्रोकरेज हाउस JM फाइनेंशियल ने मध्यम अवधि के लिए ₹355 का टारगेट दिया है। तर्क साफ है—भारत 2047 तक अपनी थर्मल पावर क्षमता को 340 गीगावॉट तक ले जाना चाहता है। BHEL के पास करीब 2.23 लाख करोड़ रुपए का ऑर्डर बुक है, जो आने वाले वर्षों की कमाई का आधार बन सकता है। सिर्फ थर्मल ही नहीं, कंपनी न्यूक्लियर एनर्जी और कोल गैसीफिकेशन जैसे क्षेत्रों में भी कदम मजबूत कर रही है। भारत ने 2047 तक न्यूक्लियर क्षमता को 8.8 GW से बढ़ाकर 100 GW करने का लक्ष्य रखा है और इस सेगमेंट में BHEL इकलौती घरेलू टर्बाइन मेकर है—यह रणनीतिक बढ़त है।
लेकिन निवेश सिर्फ संभावनाओं पर नहीं किया जाता, जोखिम भी देखना पड़ता है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि कंपनी का ऑर्डर बुक बड़ा जरूर है, लेकिन मुनाफे का अनुपात (ROIC और ROCE) अभी बहुत प्रभावशाली नहीं है। बाजार पहले ही भविष्य की रिकवरी को कीमत में शामिल कर चुका हो सकता है। प्रोजेक्ट्स के समय पर पूरे न होने का जोखिम और PSU शेयरों पर आम तौर पर दिखने वाला दबाव भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालिया तिमाही नतीजों ने जरूर उम्मीद जगाई है। दिसंबर तिमाही में कंपनी का नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 206% बढ़कर ₹382 करोड़ पहुंच गया। रेवेन्यू 16% बढ़कर ₹8,473 करोड़ रहा। यह संकेत देता है कि ऑपरेशनल सुधार शुरू हो चुका है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सुधार टिकाऊ है?
एक और महत्वपूर्ण तथ्य—यह फ्रेश इश्यू नहीं है। यह ऑफर फॉर सेल है, यानी सरकार अपनी हिस्सेदारी बेच रही है। इससे मिलने वाली पूरी रकम सरकार के खाते में जाएगी, कंपनी के पास नहीं। कंपनी की बैलेंस शीट या कर्ज पर इसका सीधा असर नहीं पड़ेगा। सरकार की हिस्सेदारी अभी 63.17% है और 5% तक की बिक्री के बाद भी नियंत्रण उसके पास ही रहेगा।
तो क्या करें? अगर आप सिर्फ डिस्काउंट देखकर आवेदन करना चाहते हैं, तो अब वह मार्जिन बहुत सीमित है। अगर आपकी नजर 2-3 साल की अवधि पर है और आपको भारत की थर्मल व न्यूक्लियर कैपेक्स कहानी पर भरोसा है, तो यह दांव समझदारी भरा हो सकता है। लेकिन अगर आप अल्पकालिक तेजी की उम्मीद में हैं, तो मौजूदा वैल्यूएशन और गिरते बाजार मूड में उतार-चढ़ाव झेलने के लिए तैयार रहना होगा।
ऊर्जा सेक्टर की कहानी लंबी है, लेकिन रास्ता सीधा नहीं है। रिन्यूएबल एनर्जी की तेज बढ़त भविष्य में कोयला आधारित परियोजनाओं पर दबाव डाल सकती है। वहीं सरकारी विनिवेश का सिलसिला आगे भी जारी रह सकता है, जिससे सप्लाई प्रेशर बनता है।
निष्कर्ष साफ है—BHEL का OFS न तो पूरी तरह सोने की खान है, न ही पूरी तरह जोखिम भरा जाल। यह उन निवेशकों के लिए है जो धैर्य, सेक्टर की समझ और उतार-चढ़ाव झेलने की क्षमता रखते हैं। फैसला आपके निवेश लक्ष्य और जोखिम सहनशीलता पर निर्भर करेगा।