वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत का निर्यात दमदार—जुलाई-सितंबर तिमाही में 8.5% उछाल, आयात वृद्धि सीमित

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दुनिया भर में आर्थिक अनिश्चितताओं और सुस्त मांग के माहौल के बावजूद भारत के व्यापार प्रदर्शन ने मजबूती के संकेत दिए हैं। वित्त वर्ष 2025-26 की जुलाई–सितंबर तिमाही में देश के कुल निर्यात में 8.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार यह बढ़ोतरी वस्तुओं और सेवाओं—दोनों क्षेत्रों से आई है, जो निर्यात ढांचे के संतुलित विस्तार को दर्शाती है।

नीति आयोग के वरिष्ठ अधिकारी प्रवाकर साहू ने ‘ट्रेड वॉच क्वार्टरली’ के छठे संस्करण के जारी होने के अवसर पर कहा कि इस तिमाही का सबसे सकारात्मक संकेत यही है कि निर्यात वृद्धि मजबूत रही, जबकि आयात वृद्धि अपेक्षाकृत नियंत्रित स्तर पर रही। इस अवधि में आयात में करीब 4.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो व्यापार संतुलन के दृष्टिकोण से अनुकूल मानी जा रही है।

रिपोर्ट बताती है कि शीर्ष निर्यात क्षेत्रों ने कुल शिपमेंट का लगभग 89 प्रतिशत हिस्सा लिया और इनमें सालाना आधार पर 7.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई। उत्तर अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख बाजारों ने इस प्रदर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरी ओर आयात वृद्धि मुख्य रूप से पूर्वी एशिया और लैटिन अमेरिका से बढ़ती मांग के कारण रही।

इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार का आकार लगभग 4.6 ट्रिलियन डॉलर आंका गया है, जिसमें भारत की हिस्सेदारी फिलहाल करीब 1 प्रतिशत है। इसे बढ़ाने की दिशा में सरकार ने केंद्रीय बजट में इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट निर्माण के लिए 40,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। अब रणनीति केवल असेंबली तक सीमित न रहकर कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग को भी बढ़ावा देने की है।

इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात भारत के निर्यात बास्केट में दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र बन चुका है। मोबाइल फोन निर्यात लगभग 50 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच गया है, जो इस क्षेत्र की तेज प्रगति का संकेत है। हालांकि, इलेक्ट्रॉनिक्स व्यापार घाटा 2016 के लगभग 35 अरब डॉलर से बढ़कर करीब 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इसका मुख्य कारण घरेलू मांग का विस्तार और कंपोनेंट्स के आयात पर निर्भरता है।

रिपोर्ट में दक्षिण-दक्षिण व्यापार के बढ़ते महत्व का भी उल्लेख है। विकासशील देशों को भारत का निर्यात 2005 के 56 अरब डॉलर से बढ़कर 250 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। यह निर्यात बाजार के विविधीकरण और उभरते देशों में बढ़ती हिस्सेदारी को दर्शाता है।

मुक्त व्यापार समझौतों की भूमिका भी उल्लेखनीय रही है। भारत ने अब तक लगभग 8-9 एफटीए पर हस्ताक्षर किए हैं, जिससे टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं में कमी आई है और विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों को बेहतर बाजार पहुंच मिली है।

श्रम बल की उपलब्धता पर उठे सवालों के जवाब में प्रवाकर साहू ने स्पष्ट किया कि यह कमी का मुद्दा नहीं, बल्कि श्रम भागीदारी बढ़ाने का विषय है। पिछले पांच वर्षों में श्रम बल भागीदारी दर में वृद्धि के पर्याप्त संकेत मिले हैं। कुल मिलाकर, भारत का निर्यात प्रदर्शन यह दर्शाता है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद अर्थव्यवस्था लचीलेपन और विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रही है।

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