जनवरी में थोक महंगाई दर (WPI) बढ़कर 1.81% पर पहुंच गई है, जो पिछले दस महीनों का उच्च स्तर है। दिसंबर में यह 0.83% थी। ताज़ा आंकड़े वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार ने 16 फरवरी को जारी किए। इससे पहले मार्च 2025 में WPI 2.05% पर थी। मौजूदा उछाल का प्रमुख कारण रोजमर्रा की वस्तुओं और खाद्य कीमतों में बढ़ोतरी है।
प्राइमरी आर्टिकल्स—जिनका वेटेज 22.62% है—की महंगाई 0.21% से बढ़कर 2.21% हो गई। फूड इंडेक्स माइनस 0.43% से उछलकर 1.55% पर पहुंचा, जो खाद्य वस्तुओं में तेजी का संकेत देता है। मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स (वेटेज 64.23%) की थोक महंगाई 1.82% से बढ़कर 2.86% हो गई, जबकि फ्यूल और पावर (वेटेज 13.15%) में गिरावट जारी रही और यह माइनस 4.01% पर आ गई। WPI के दायरे में फूड आर्टिकल्स (अनाज, गेहूं, सब्जियां), नॉन-फूड आर्टिकल्स (जैसे ऑयल सीड), मिनरल्स और क्रूड पेट्रोलियम शामिल हैं।
खुदरा मोर्चे पर भी दबाव दिखा है। जनवरी में रिटेल महंगाई (CPI) 2.75% पर पहुंच गई, जो दिसंबर के 1.33% से अधिक है और आठ महीनों का उच्च स्तर है। CPI आम उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतों को दर्शाता है, जबकि WPI थोक बाजार में एक कारोबारी द्वारा दूसरे कारोबारी से वसूली गई कीमतों पर आधारित होता है।
थोक महंगाई लंबे समय तक ऊंची रहने पर उत्पादन क्षेत्रों पर लागत का दबाव बढ़ता है। अक्सर निर्माता इस बोझ का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं पर डाल देते हैं, जिससे खुदरा कीमतों पर असर पड़ सकता है। सरकार कर नीति—जैसे ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती—के जरिए सीमित दायरे में राहत दे सकती है, लेकिन इसकी भी एक सीमा होती है। WPI में मेटल, केमिकल, प्लास्टिक और रबर जैसे औद्योगिक इनपुट्स का बड़ा हिस्सा होता है, इसलिए इसमें बदलाव का असर व्यापक सप्लाई चेन पर दिख सकता है।
कुल मिलाकर, जनवरी के आंकड़े संकेत देते हैं कि खाद्य और विनिर्माण कीमतों में तेजी ने थोक स्तर पर दबाव बढ़ाया है। आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि आपूर्ति स्थितियां, ईंधन कीमतें और वैश्विक रुझान किस तरह से संतुलित होते हैं—क्योंकि यही कारक थोक से खुदरा तक महंगाई की राह तय करते हैं।