मुंबई आज वैश्विक कूटनीति के केंद्र में है। भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi और फ्रांस के राष्ट्रपति Emmanuel Macron के बीच होने वाली उच्चस्तरीय द्विपक्षीय वार्ता को केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं, बल्कि आने वाले दशक की रणनीतिक दिशा तय करने वाली बैठक माना जा रहा है। ऐसे समय में जब वैश्विक भू-राजनीति तेजी से बदल रही है, यह शिखर संवाद भारत-फ्रांस संबंधों को नए आयाम देने वाला साबित हो सकता है।
फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों तीन दिवसीय भारत यात्रा पर मुंबई पहुंचे हैं। यह दौरा उस पृष्ठभूमि में हो रहा है जब भारत-फ्रांस रक्षा सहयोग लगातार गहराता गया है और रणनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि क्या फ्रांस अब भारत के लिए “नया रूस” बनता जा रहा है। दशकों तक रूस भारत का सबसे विश्वसनीय रक्षा साझेदार रहा, लेकिन बदलते वैश्विक समीकरणों और तकनीकी साझेदारी की नई जरूरतों ने फ्रांस को एक अहम स्तंभ के रूप में उभारा है।
रक्षा सहयोग की बात करें तो हाल के वर्षों में Dassault Aviation द्वारा निर्मित Dassault Rafale लड़ाकू विमानों की खरीद ने दोनों देशों के रिश्तों को नई मजबूती दी है। राफेल डील केवल विमानों की खरीद तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसके साथ प्रशिक्षण, रखरखाव, स्पेयर सप्लाई और तकनीकी तालमेल का एक दीर्घकालिक ढांचा भी विकसित हुआ। अब खबरें हैं कि भारत अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद पर भी विचार कर रहा है, जिससे भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता और सामरिक तैयारी में और वृद्धि हो सकती है।
बेंगलुरु में भारत के रक्षा मंत्री Rajnath Singh और फ्रांस की रक्षा मंत्री Catherine Vautrin के बीच प्रस्तावित बैठक भी इस यात्रा का अहम हिस्सा है। सूत्रों के अनुसार रक्षा सहयोग समझौते को अगले दस वर्षों के लिए नवीनीकृत करने और ‘हैमर’ मिसाइलों के संयुक्त विनिर्माण पर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर की संभावना जताई जा रही है। यदि यह सह-उत्पादन मॉडल आगे बढ़ता है, तो भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति को नया बल मिलेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-फ्रांस संबंध अब पारंपरिक खरीदार-विक्रेता मॉडल से आगे निकल चुके हैं। सह-विकास, तकनीकी हस्तांतरण और संयुक्त उत्पादन की दिशा में उठाए गए कदम इस साझेदारी को अधिक संतुलित और दीर्घकालिक बना रहे हैं। यही कारण है कि रणनीतिक समुदाय में फ्रांस को “नया रूस” कहे जाने की चर्चा हो रही है—हालांकि दोनों देशों के संबंधों की प्रकृति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अलग-अलग है।
लेकिन यह शिखर वार्ता केवल रक्षा तक सीमित नहीं है। मुंबई में दोनों नेता ‘इंडिया-फ्रांस ईयर ऑफ इनोवेशन 2026’ का संयुक्त उद्घाटन करेंगे, जो तकनीक, स्टार्ट-अप, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में नई साझेदारी का संकेत है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल टेक्नोलॉजी, अंतरिक्ष अनुसंधान, समुद्री सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी विशेष जोर रहेगा। राष्ट्रपति मैक्रों भारत द्वारा आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में भी हिस्सा लेंगे, जिससे उभरती तकनीकों में साझेदारी की नई संभावनाएं खुल सकती हैं।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की मजबूती और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की अवधारणा—ये सभी मुद्दे इस वार्ता के केंद्र में रहेंगे। भारत और फ्रांस दोनों रणनीतिक स्वायत्तता के पक्षधर हैं और किसी एक ध्रुव पर निर्भर रहने के बजाय संतुलित वैश्विक भूमिका निभाने की नीति अपनाते हैं। ऐसे में यह साझेदारी केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी महत्वपूर्ण बन जाती है।
मुंबई में होने वाली यह मुलाकात आने वाले वर्षों में भारत-फ्रांस संबंधों की दिशा तय कर सकती है। रक्षा, तकनीक और नवाचार के संगम पर खड़ी यह साझेदारी अब एक नए चरण में प्रवेश करती दिख रही है—जहां भरोसा, तकनीकी क्षमता और साझा रणनीतिक दृष्टि, दोनों देशों को और करीब ला सकती है।