छत्तीसगढ़ के मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले में स्थित स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूल एक महीने से दो गंभीर आरोपों को लेकर चर्चा में है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर अब तक सिर्फ जांच की प्रक्रिया ही बदलती दिख रही है। एक ओर दसवीं के छात्र को कथित तौर पर 100 बार उठक-बैठक की सजा दिए जाने का मामला है, तो दूसरी ओर एक महिला कर्मचारी ने हिंदी माध्यम के व्याख्याता पर मानसिक प्रताड़ना और दुर्व्यवहार के संगीन आरोप लगाए हैं। दोनों मामलों में पीड़ित पक्ष कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहा है, जबकि प्रशासनिक स्तर पर जांच की रफ्तार सवालों के घेरे में है।
पहला मामला उस छात्र से जुड़ा है, जिसे जनवरी में कक्षा के भीतर कथित अनुशासनात्मक कारणों से दो शिक्षिकाओं—रुचि भागे और वर्षा प्रधान—द्वारा सौ बार उठक-बैठक करने को मजबूर किया गया। परिजनों का दावा है कि इस सजा के बाद छात्र की शारीरिक स्थिति बिगड़ गई और वह सामान्य रूप से उठ-बैठ भी नहीं पा रहा है। पिछले एक महीने से उसका इलाज रायपुर के एक निजी अस्पताल में कराया जा रहा है। इस बीच 21 फरवरी से उसकी दसवीं बोर्ड परीक्षा भी प्रस्तावित है, जिससे परिवार की चिंता और बढ़ गई है। अभिभावकों का कहना है कि गरीब पृष्ठभूमि से होने के बावजूद वे बेटे के इलाज में जुटे हैं, लेकिन जिम्मेदारों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
दूसरा मामला स्कूल की एक सहायक ग्रेड-3 महिला कर्मचारी की शिकायत से जुड़ा है। उन्होंने हिंदी माध्यम के भौतिक शास्त्र के व्याख्याता सुशील चौरसिया पर मानसिक प्रताड़ना, दुर्व्यवहार, अश्लील हरकत और उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़िता ने कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और जिला शिक्षा अधिकारी को लिखित शिकायत सौंपकर निष्पक्ष जांच और कठोर कार्रवाई की मांग की है। हालांकि आरोप है कि जांच प्रक्रिया में लगातार ढिलाई बरती जा रही है और अब तक तीन बार जांच अधिकारी बदले जा चुके हैं।
बताया जा रहा है कि जिन प्राचार्यों और विकासखंड शिक्षा अधिकारियों को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई, उन्होंने प्रशासनिक निर्देशों का पालन करने में अनिच्छा जताते हुए लिखित जवाब भेज दिया। इससे जांच की पारदर्शिता और गंभीरता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। महिला उत्पीड़न के मामले में 4 फरवरी को जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने एक आदेश जारी कर प्राचार्य सुनीता कावरे, शशि कुजूर (सहायक ग्रेड-2), ममता चौरे (सहायक ग्रेड-3) और भृत्य सुनीता नेताम को जांच दल में शामिल किया। इस नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या इतने गंभीर आरोपों की जांच के लिए यह स्तर पर्याप्त और उपयुक्त है।
आरोप यह भी है कि संबंधित व्याख्याता को बचाने के प्रयास किए जा रहे हैं और छात्रों को कथन देने के लिए आगे किया जा रहा है। जबकि शिकायतकर्ता का कहना है कि जिस घटना का उल्लेख आवेदन में है, वह कक्षा के भीतर छात्रों की उपस्थिति में हुई ही नहीं, ऐसे में छात्रों के बयान की आवश्यकता पर भी प्रश्न उठ रहे हैं। परीक्षा से ठीक दो दिन पहले 12वीं के छात्रों के कथन लिए जाने को भी कई लोग जांच की दिशा से भटकाव मान रहे हैं।
इन दोनों मामलों के चलते अंबागढ़ चौकी क्षेत्र में प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा तेज है। स्थानीय स्तर पर यह सवाल उठाया जा रहा है कि यदि एक छात्र की सेहत पर असर पड़ने और एक महिला कर्मचारी की गंभीर शिकायत के बावजूद एक महीने तक निर्णायक कार्रवाई नहीं होती, तो व्यवस्था पर भरोसा कैसे कायम रहेगा।
जिला शिक्षा अधिकारी योगदास साहू ने कहा है कि किसी प्रकार की लीपापोती नहीं की जा रही और पूरी तरह से निष्पक्ष जांच की जा रही है। उनके अनुसार जांच पूरी होने के बाद आगे की कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। हालांकि पीड़ित पक्ष और स्थानीय नागरिकों की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि जांच का निष्कर्ष कब सामने आता है और क्या वास्तव में जिम्मेदारों पर ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं।