चुनावी राज्यों में मुफ्त योजनाओं और नकद वितरण की बढ़ती प्रवृत्ति पर देश की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि बिना ठोस नीति और लक्ष्य के सीधे नकद हस्तांतरण या मुफ्त सुविधाएं बांटना दीर्घकालिक रूप से देश के लिए नुकसानदेह हो सकता है। न्यायालय का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति अनियंत्रित रूप से जारी रही, तो इससे कार्य संस्कृति और आर्थिक अनुशासन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
यह टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश Surya Kant, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने एक सुनवाई के दौरान की। पीठ ने सवाल उठाया कि यदि सरकारें लगातार लोगों के बैंक खातों में धनराशि भेजती रहेंगी, तो क्या इससे काम करने की प्रेरणा प्रभावित नहीं होगी? अदालत ने संकेत दिया कि राष्ट्र की उत्पादकता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के बजाय यदि निर्भरता की प्रवृत्ति बढ़े, तो यह चिंताजनक स्थिति हो सकती है।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा और राजनीतिक तुष्टिकरण के बीच अंतर स्पष्ट करने की आवश्यकता पर बल दिया। अदालत ने कहा कि जरूरतमंदों की सहायता करना सरकार का दायित्व है, लेकिन संपन्न और सक्षम वर्ग को भी समान रूप से सब्सिडी या राहत देना नीतिगत संतुलन के विपरीत हो सकता है। उदाहरण के तौर पर बिजली बिल माफी जैसी योजनाओं का जिक्र करते हुए अदालत ने पूछा कि क्या आय और क्षमता के आधार पर अंतर नहीं किया जाना चाहिए?
पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि कई राज्य सरकारें बुनियादी ढांचे—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन—में दीर्घकालिक निवेश करने के बजाय चुनावी समय में तात्कालिक लाभ पहुंचाने वाली घोषणाओं पर अधिक जोर दे रही हैं। न्यायालय ने कहा कि संसाधनों का उपयोग भविष्य की आर्थिक मजबूती के लिए होना चाहिए, न कि केवल अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए।
यह बहस ऐसे समय में तेज हुई है जब 2026 के विधानसभा चुनावों की तैयारी कर रहे कुछ राज्यों में नकद सहायता और मुफ्त योजनाओं की घोषणाएं चर्चा में हैं। तमिलनाडु में ‘Kalaignar Magalir Urimai Thittam’ के तहत महिलाओं को अग्रिम राशि दी गई है, पश्चिम बंगाल में ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना की राशि बढ़ाई गई है, वहीं असम और केरल में भी नकद सहायता कार्यक्रम चल रहे हैं। इन कदमों को लेकर राजनीतिक और आर्थिक विश्लेषकों के बीच मतभेद हैं—कुछ इन्हें सामाजिक सुरक्षा मानते हैं, तो कुछ वित्तीय अनुशासन के विरुद्ध कदम।
अदालत ने राजनीतिक समुदाय से संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की अपील की है। न्यायालय के अनुसार, सशक्तिकरण का अर्थ लोगों को रोजगार और अवसर देना है, न कि स्थायी रूप से सहायता पर निर्भर बना देना। जरूरतमंदों की मदद करना आवश्यक है, लेकिन नीति बनाते समय वित्तीय स्थिरता और दीर्घकालिक विकास को प्राथमिकता देना भी उतना ही जरूरी है।
इस टिप्पणी के बाद ‘फ्रीबीज’ बनाम ‘विकास’ की बहस एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र में आ गई है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकारें सामाजिक कल्याण और आर्थिक अनुशासन के बीच किस तरह संतुलन स्थापित करती हैं।