डिजिटल दुनिया में तेजी से बढ़ रहे एआई कंटेंट और डीपफेक के खतरे को देखते हुए सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। अब अगर कोई फोटो, वीडियो या ऑडियो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से बनाया गया है, तो उस पर साफ तौर पर ‘AI जनरेटेड’ का लेबल लगाना अनिवार्य होगा। इतना ही नहीं, किसी भी आपत्तिजनक या गैरकानूनी कंटेंट की शिकायत मिलने पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को महज 3 घंटे के भीतर उसे हटाना होगा। ये संशोधित आईटी नियम 20 फरवरी 2026 से देशभर में लागू हो चुके हैं।
इन नियमों का नोटिफिकेशन 10 फरवरी को जारी हुआ था। इससे एक दिन पहले 19 फरवरी को आयोजित AI समिट में प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी डिजिटल कंटेंट पर ‘ऑथेंटिसिटी लेबल’ की जरूरत पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि जैसे खाने के पैकेट पर न्यूट्रिशन लेबल होता है, वैसे ही डिजिटल सामग्री पर भी स्पष्ट जानकारी होनी चाहिए, ताकि लोगों को समझ आ सके कि क्या असली है और क्या एआई से निर्मित।
नए प्रावधानों के तहत हर एआई-निर्मित फोटो, वीडियो या ऑडियो पर एक स्पष्ट डिजिटल स्टैम्प लगाया जाएगा। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी नेता का भाषण एआई की मदद से तैयार किया गया है, तो वीडियो के कोने में “AI Generated” लिखना जरूरी होगा। इसके साथ ही हर फाइल में एक ‘टेक्निकल मार्कर’ या कहें डिजिटल डीएनए जोड़ा जाएगा। यह मेटाडेटा फाइल की कोडिंग में छिपा रहेगा और बताएगा कि कंटेंट कब, किस टूल से और किस प्लेटफॉर्म पर पहली बार बनाया या अपलोड किया गया।
सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि इस लेबल या मेटाडेटा से छेड़छाड़ गैरकानूनी मानी जाएगी। पहले लोग एआई वीडियो या फोटो से वॉटरमार्क हटाकर उसे असली दिखाने की कोशिश करते थे। अब प्लेटफॉर्म्स को ऐसी तकनीक अपनानी होगी, जिससे लेबल हटाने या बदलने की कोशिश होते ही कंटेंट स्वतः हट जाए।
चाइल्ड पोर्नोग्राफी, अश्लीलता, धोखाधड़ी, हथियारों से जुड़ी जानकारी या किसी की पहचान की नकल कर बनाई गई सामग्री को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। हाल के वर्षों में अभिनेत्री Rashmika Mandanna और क्रिकेटर Sachin Tendulkar से जुड़े डीपफेक वीडियो वायरल होने के बाद इस विषय पर चिंता और बढ़ी थी।
आईटी नियमों में सबसे बड़ा बदलाव कंटेंट हटाने की समयसीमा को लेकर हुआ है। पहले प्लेटफॉर्म्स को गैरकानूनी सामग्री हटाने के लिए 36 घंटे का समय मिलता था, जिसे अब घटाकर सिर्फ 3 घंटे कर दिया गया है। कोर्ट या सरकार के आदेश के बाद यह समयसीमा तत्काल प्रभाव से लागू होगी, और पुलिस विभाग में कम से कम डीआईजी रैंक का अधिकारी ऐसे आदेश जारी कर सकेगा।
अब सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। हर यूजर से कंटेंट अपलोड करते समय यह घोषणा ली जाएगी कि सामग्री एआई से बनी है या नहीं। कंपनियों को ऐसे टूल्स लगाने होंगे जो इस दावे की जांच कर सकें। यदि कोई प्लेटफॉर्म बिना डिस्क्लोजर के एआई कंटेंट प्रकाशित होने देता है, तो वह स्वयं जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
हालांकि ‘सेफ हार्बर’ यानी कानूनी सुरक्षा तब तक बनी रहेगी, जब तक कंपनियां नियमों का पालन करती रहेंगी। नियमों की अनदेखी करने पर यह सुरक्षा खत्म हो सकती है और प्लेटफॉर्म पर भी कार्रवाई संभव है। एआई टूल बनाने वाली कंपनियों को भी यूजर्स को स्पष्ट चेतावनी देनी होगी कि गलत या आपराधिक कंटेंट बनाने पर मौजूदा कानूनों—जैसे आईटी एक्ट 2000 और भारतीय न्याय संहिता—के तहत सजा हो सकती है।
सरकार का कहना है कि इन कदमों से इंटरनेट को अधिक सुरक्षित, भरोसेमंद और जवाबदेह बनाया जा सकेगा। जनरेटिव एआई के दौर में मिस-इनफॉर्मेशन, इम्पर्सनेशन और चुनावी हेरफेर जैसे जोखिमों से निपटने के लिए यह कदम जरूरी माना जा रहा है।
डिजिटल क्रांति के इस दौर में जहां एआई नई संभावनाएं खोल रहा है, वहीं इन नए नियमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तकनीक के साथ जवाबदेही भी उतनी ही अनिवार्य होगी।