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धार की भोजशाला पर एएसआई की रिपोर्ट ने खोले इतिहास के कई परतें, अब अदालत के फैसले पर टिकी निगाहें

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मध्यप्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर वर्षों से चल रहा विवाद अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा तैयार की गई विस्तृत सर्वे रिपोर्ट न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बन चुकी है और इंदौर खंडपीठ ने सभी पक्षों को दो सप्ताह के भीतर अपनी आपत्तियां और सुझाव दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद होने वाली अगली सुनवाई में इन्हीं बिंदुओं के आधार पर आगे की दिशा तय की जाएगी। यह सर्वेक्षण हाईकोर्ट के आदेश पर कराया गया था, जिससे इस ऐतिहासिक स्थल की वास्तविक पृष्ठभूमि को दस्तावेजी आधार पर स्पष्ट किया जा सके।

सर्वे की प्रक्रिया मार्च 2024 में शुरू हुई और लगभग सौ दिनों तक चली। इस दौरान पुरातत्वविदों, अभिलेख विशेषज्ञों, रसायनविदों और तकनीकी कर्मचारियों की संयुक्त टीम ने मुख्य परिसर के साथ-साथ उसके चारों ओर 50 मीटर की परिधि का भी सूक्ष्म अध्ययन किया। केवल सतही निरीक्षण ही नहीं, बल्कि सीमित उत्खनन, संरचनात्मक विश्लेषण और अभिलेखों का वैज्ञानिक परीक्षण भी किया गया। रिपोर्ट में उल्लेख है कि इस परिसर से 12वीं सदी से लेकर 20वीं सदी तक के अलग-अलग कालखंडों के शिलालेख और स्थापत्य अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इस स्थल की बहुस्तरीय ऐतिहासिक यात्रा की ओर संकेत करते हैं।

रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू 12वीं सदी के संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों का मिलना है। नागरी लिपि में लिखे गए इन अभिलेखों में परमार कालीन साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। एक विस्तृत अभिलेख में ‘पारिजातमंजरी’ नामक नाटिका का जिक्र है, जिसे परमार शासक अर्जुनवर्मन के गुरु मदन द्वारा रचित बताया गया है। प्रस्तावना में यह उल्लेख मिलता है कि इस नाटिका का मंचन देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर में हुआ था। इसी आधार पर यह तर्क सामने आया है कि भोजशाला परिसर प्राचीन काल में सरस्वती मंदिर रहा होगा। एक अन्य अभिलेख में ‘अवनिकर्मसातम’ नामक काव्य का उल्लेख मिलता है, जिसे परंपरा में भोजदेव से जोड़ा जाता है। इन संदर्भों को ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

हालांकि रिपोर्ट केवल एक ही पक्ष की पुष्टि नहीं करती, बल्कि यह भी दर्ज करती है कि बाद के कालखंडों में यहां अरबी और फारसी भाषा के शिलालेख भी स्थापित किए गए। ये अभिलेख इस ओर संकेत करते हैं कि मुस्लिम शासनकाल के दौरान इस स्थल के उपयोग और स्वरूप में परिवर्तन आया। फारसी लेखों की उपस्थिति इस ऐतिहासिक बदलाव का प्रमाण मानी जा रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भोजशाला परिसर ने अलग-अलग कालखंडों में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक प्रभावों को आत्मसात किया।

एएसआई की रिपोर्ट इस स्थल को किसी एक आयाम में सीमित नहीं करती, बल्कि इसे बहुस्तरीय ऐतिहासिक परंपराओं का साक्षी बताती है। प्रारंभिक प्रमाण जहां परमार कालीन सरस्वती मंदिर की ओर इशारा करते हैं, वहीं बाद के अभिलेख इस स्थान के मुस्लिम समुदाय से जुड़े उपयोग को भी दर्ज करते हैं। इस प्रकार भोजशाला का इतिहास एक क्रमिक विकास की कहानी प्रस्तुत करता है, जिसमें सत्ता परिवर्तन और सांस्कृतिक बदलावों की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

अब पूरा मामला न्यायालय के समक्ष है। अदालत सभी पक्षों द्वारा प्रस्तुत आपत्तियों, ऐतिहासिक तर्कों और कानूनी दलीलों पर विचार करेगी। एएसआई की यह रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह पहली बार वैज्ञानिक और अभिलेखीय आधार पर इस स्थल के इतिहास को व्यवस्थित रूप से सामने लाती है। अंतिम निर्णय तथ्यों, प्रमाणों और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप ही लिया जाएगा।

धार की भोजशाला केवल एक धार्मिक स्थल का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भारत के बहुस्तरीय इतिहास, सांस्कृतिक परिवर्तन और सहअस्तित्व की जटिल यात्रा का प्रतीक भी है। अब देखना यह है कि अदालत इन ऐतिहासिक तथ्यों की रोशनी में किस निष्कर्ष पर पहुंचती है और आने वाले समय में इस विवाद का समाधान किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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