50% टैरिफ के बीच भी इकोनॉमी मजबूत, तीसरी तिमाही में 7.8% ग्रोथ; अब कुक-ड्राइवर की कमाई भी GDP में शामिल

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वित्त वर्ष 2025-26 की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में भारत की अर्थव्यवस्था ने 7.8% की मजबूत रफ्तार से बढ़त दर्ज की है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, इस बार जीडीपी की गणना नए बेस ईयर 2022-23 के आधार पर की गई है, जिससे आंकड़ों की सटीकता और दायरा दोनों बढ़े हैं।

नई सीरीज के अनुसार इस तिमाही में रियल जीडीपी 84.54 लाख करोड़ रुपये रही, जो पिछले साल इसी अवधि में 78.41 लाख करोड़ रुपये थी। सरकार ने पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अनुमानित ग्रोथ रेट भी बढ़ाकर 7.6% कर दिया है, जो पिछले वर्ष 7.1% थी।

क्या कहती हैं मुख्य बातें?

वित्त वर्ष 2026 में रियल जीडीपी ग्रोथ 7.6% रहने का अनुमान है, जबकि नॉमिनल जीडीपी में 8.6% की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। दूसरी तिमाही में 8.4% और तीसरी तिमाही में 7.8% की रफ्तार ने सालाना अनुमान को मजबूत आधार दिया है। इससे पहले FY24 में 7.2% और FY25 में 7.1% की वृद्धि दर्ज की गई थी।

टैरिफ और वैश्विक दबाव के बावजूद मजबूती

ये आंकड़े इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ के बाद की पहली पूरी तिमाही को दर्शाते हैं। वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद 7.8% की वृद्धि यह संकेत देती है कि घरेलू मांग, निवेश और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में मजबूती बनी हुई है।

नई बेस ईयर और बड़ा डेटा कवरेज

इस बार 2011-12 की जगह 2022-23 को बेस ईयर बनाया गया है। इससे आर्थिक गतिविधियों की मौजूदा वास्तविकता को बेहतर तरीके से मापा जा सकेगा। नई सीरीज में जीएसटी नेटवर्क, ई-वाहन डेटाबेस और घरेलू कामगारों जैसे कुक, ड्राइवर और अन्य सेवाओं से जुड़ा डेटा भी शामिल किया गया है। इससे अर्थव्यवस्था की व्यापक तस्वीर सामने आती है।

आमतौर पर बेस ईयर हर पांच साल में बदला जाता है, लेकिन कोविड और जीएसटी के कारण इस प्रक्रिया में देरी हुई थी। अब सरकार 1950-51 तक के पुराने आंकड़ों को भी नए बेस ईयर के आधार पर दोबारा जारी करेगी, जिनके दिसंबर 2026 तक आने की उम्मीद है।

बेस ईयर क्या होता है?

बेस ईयर वह वर्ष होता है जिसकी कीमतों को स्थिर मानकर आज की वास्तविक आर्थिक वृद्धि को मापा जाता है। इससे महंगाई का असर हटाकर असली उत्पादन वृद्धि समझने में मदद मिलती है।

उदाहरण के तौर पर, अगर 2011 में एक पेन 5 रुपये का था और आज 10 रुपये का है, तो समान उत्पादन के बावजूद कीमतों के अंतर से नॉमिनल जीडीपी बढ़ी हुई दिखेगी। बेस ईयर से यह पता चलता है कि उत्पादन वास्तव में बढ़ा है या सिर्फ कीमतें बढ़ी हैं।

GDP क्या बताती है?

GDP यानी सकल घरेलू उत्पाद, एक तय समय में देश के भीतर बने सामान और दी गई सेवाओं की कुल वैल्यू को दर्शाता है। इसे देश की आर्थिक सेहत का रिपोर्ट कार्ड कहा जाता है। इसमें घरेलू और विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में किया गया उत्पादन शामिल होता है।

रियल और नॉमिनल जीडीपी में फर्क

रियल जीडीपी बेस ईयर की स्थिर कीमतों पर मापी जाती है और वास्तविक उत्पादन वृद्धि दिखाती है।
नॉमिनल जीडीपी मौजूदा बाजार कीमतों पर आधारित होती है, जिसमें महंगाई का असर भी शामिल रहता है।

कैसे निकाली जाती है जीडीपी?

जीडीपी की गणना एक सूत्र से की जाती है:

GDP = C + G + I + NX

C यानी उपभोग (लोगों का खर्च)
G यानी सरकारी खर्च
I यानी निवेश
NX यानी नेट एक्सपोर्ट (निर्यात माइनस आयात)

कुल मिलाकर, तीसरी तिमाही के आंकड़े संकेत देते हैं कि वैश्विक दबावों के बीच भी भारत की अर्थव्यवस्था घरेलू मांग और निवेश के सहारे मजबूती से आगे बढ़ रही है। नई बेस ईयर और विस्तृत डेटा कवरेज से अब अर्थव्यवस्था की तस्वीर और भी स्पष्ट होगी।

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