छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र के पांचवें दिन एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने राज्य की राजनीति और सुरक्षा परिदृश्य दोनों को नई दिशा का संकेत दिया। 120 आत्मसमर्पित नक्सली विधानसभा पहुंचे और सदन की कार्यवाही को दर्शक दीर्घा से देखा। यह सिर्फ एक औपचारिक दौरा नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया से उनके जुड़ाव का प्रतीक माना जा रहा है।
सदन की कार्यवाही के दौरान सभापति ने आसंदी से ही इन पुनर्वासित नक्सलियों का स्वागत किया और उन्हें मुख्यधारा में लौटने के लिए शुभकामनाएं दीं। सरकार के वरिष्ठ सदस्यों ने इसे राज्य की नई पुनर्वास नीति का सकारात्मक परिणाम बताया।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि सरकार आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए प्रभावी पुनर्वास नीति लेकर आई है। इसी का असर है कि बड़ी संख्या में माओवादी संगठन छोड़कर मुख्यधारा में लौट रहे हैं। उन्होंने बताया कि आत्मसमर्पित नक्सलियों को आर्थिक सहायता, कृषि के लिए जमीन और आजीविका के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे, ताकि वे स्थायी रूप से समाज का हिस्सा बन सकें।
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने विधानसभा परिसर में अपने कक्ष में इन सभी का स्वागत किया। उन्होंने संवाद के दौरान उनके फैसले की सराहना की और लोकतांत्रिक व्यवस्था को नजदीक से समझने का अवसर मिलने पर संतोष जताया। इनमें से सात पूर्व नक्सलियों को अध्यक्षीय दीर्घा में बैठाया गया, जहां से उन्होंने प्रश्नकाल और ध्यानाकर्षण प्रस्ताव की कार्यवाही देखी। उस समय सदन में शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा चल रही थी।
बताया गया कि आत्मसमर्पण करने वालों में नक्सली संगठन के पूर्व प्रवक्ता रूपेश भी शामिल थे। एक दिन पहले गृहमंत्री विजय शर्मा ने 150 से अधिक आत्मसमर्पित नक्सलियों को अपने नया रायपुर स्थित शासकीय निवास पर रात्रिभोज के लिए आमंत्रित किया था। इसे विश्वास बहाली और पुनर्वास प्रक्रिया को मजबूत करने की पहल के रूप में देखा जा रहा है।
सरकार का कहना है कि यह पहल केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक शांति और विकास की दिशा में उठाया गया कदम है। बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण को प्रशासन अपनी नीति की सफलता के तौर पर देख रहा है। संदेश साफ है—जो हथियार छोड़कर लोकतंत्र की राह चुनेंगे, उनके लिए दरवाजे खुले हैं।