होर्मुज में तनाव से भारत की 50% तेल सप्लाई पर खतरा, ऊर्जा सुरक्षा पर बढ़ी चिंता

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मध्य-पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार की धुरी बन गया है। Israel और Iran के बीच हालिया घटनाक्रम के बाद यह आशंका जताई जा रही है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही बाधित होती है, तो भारत की कच्चे तेल की आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।

डेटा के अनुसार, जनवरी-फरवरी के दौरान भारत के कुल मासिक कच्चे तेल आयात का लगभग 50% हिस्सा इसी मार्ग से आया। वर्तमान में भारत रोजाना करीब 26 लाख बैरल कच्चा तेल होर्मुज के रास्ते आयात करता है। यह तेल मुख्यतः Iraq, Saudi Arabia, United Arab Emirates और Kuwait से आता है। यदि यह समुद्री मार्ग बाधित होता है, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा दबाव पड़ेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज में किसी भी प्रकार की रुकावट से वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इसका असर भारत के आयात बिल, शिपिंग लागत, बीमा प्रीमियम और घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ेगा। ऊर्जा विश्लेषकों के मुताबिक, यह स्थिति भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए दोहरी चुनौती पैदा कर सकती है—एक ओर सप्लाई बाधित होने का जोखिम और दूसरी ओर लागत में तेज बढ़ोतरी।

वैकल्पिक मार्गों के रूप में सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन (रेड सी की ओर) और यूएई की अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन (फुजैरा तक) का उपयोग किया जा सकता है। हालांकि इनकी क्षमता सीमित है और ये पूरी आपूर्ति की कमी की भरपाई नहीं कर पाएंगी।

हाल के महीनों में भारत ने मध्य-पूर्व से आयात बढ़ाया है। फरवरी में कुल आयात 54.7 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया, जो जनवरी में 51.4 लाख बैरल प्रतिदिन था। रूस से आयात भी बढ़ा है, लेकिन उस पर पश्चिमी प्रतिबंधों की पाबंदियां बनी हुई हैं। Donald Trump द्वारा पहले दिए गए बयान के बाद रूस से तेल आयात का मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो सकता है।

यदि होर्मुज में संकट गहराता है, तो भारत को रूस, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका (नाइजीरिया, अंगोला) और लैटिन अमेरिका (ब्राजील, कोलंबिया, वेनेजुएला) जैसे स्रोतों की ओर रुख करना पड़ सकता है। लेकिन इन मार्गों से तेल लाने में दूरी अधिक है, जिससे फ्रेट लागत बढ़ेगी और आयात महंगा पड़ेगा।

यह ध्यान देने योग्य है कि होर्मुज से सिर्फ कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि भारत के रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी जुड़ा है। इस वर्ष अब तक भारत लगभग 74,000 बैरल प्रतिदिन रिफाइंड उत्पाद इसी मार्ग से निर्यात कर चुका है। किसी भी व्यवधान की स्थिति में शिपिंग मार्ग बदलने पड़ेंगे, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ेंगे।

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया की लगभग 20% तेल खपत होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरती है। ऐसे में वहां की अस्थिरता सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संकट का रूप ले सकती है। भारत के लिए यह स्थिति ऊर्जा आपूर्ति के विविधीकरण और रणनीतिक भंडार को मजबूत करने की आवश्यकता को फिर से रेखांकित करती है।

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