आयुष्मान योजना को लेकर एक बार फिर छत्तीसगढ़ के निजी अस्पतालों पर सवालों का बादल घिरता नजर आ रहा है। इस बार मामला ओडिशा से आने वाले मरीजों और छोटे अस्पतालों में थोक में हुए ऑपरेशनों का है, जिसने राष्ट्रीय स्तर तक हलचल मचा दी है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण यानी National Health Authority के ‘फॉल्स ट्रिगर’ में आए मामलों ने नई जांच की आहट दे दी है।
रायपुर और आसपास के मोवा इलाके के छोटे, पचास से कम बेड वाले अस्पतालों में बड़ी संख्या में पाइल्स और हाइड्रोसिल जैसी सर्जरी होने की जानकारी सामने आई है। ओडिशा सरकार ने इन सर्जरियों से जुड़ा डेटा एनएचए को भेजा, जिसके बाद केंद्र स्तर पर हुई ऑनलाइन समीक्षा बैठक में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा। अधिकारियों ने छत्तीसगढ़ में आयुष्मान के समग्र संचालन पर संतोष तो जताया, लेकिन ओडिशा से एक ही पैटर्न में बड़ी संख्या में आए मरीजों और सीमित श्रेणी की सर्जरी पर संदेह भी दर्ज किया।
बैठक में यह बात रेखांकित की गई कि मरीज किसी एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र से समूह में अस्पताल पहुंचे। इससे यह आशंका बलवती हुई कि कहीं कमीशन आधारित रेफरल नेटवर्क सक्रिय तो नहीं। सूत्रों के मुताबिक, स्टेट नोडल एजेंसी को अपने स्तर पर प्राथमिक जांच के निर्देश दिए गए हैं। होली के बाद ओडिशा और राज्य स्तरीय एजेंसी के प्रतिनिधियों के संयुक्त दौरे की संभावना भी जताई जा रही है, जिससे यह स्पष्ट है कि मामला फिलहाल ठंडे बस्ते में जाने वाला नहीं।
इसी बीच आयुष्मान पोर्टल के नए एआई आधारित सिस्टम ने भी कई निजी अस्पतालों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इंपैनलमेंट बनाए रखने के लिए आवश्यक मानकों—खासतौर पर एमबीबीएस डॉक्टरों की संख्या और 20 बेड पर एक डॉक्टर की अनिवार्यता—को लेकर अधूरी या गलत जानकारी देने वाले अस्पतालों के क्लेम स्वतः रिजेक्ट हो रहे हैं। एआई सिस्टम अब मानव त्रुटि की गुंजाइश कम कर रहा है, लेकिन इससे उन संस्थानों पर दबाव बढ़ा है जो दस्तावेजी अनुपालन में ढिलाई बरतते रहे हैं।
ओडिशा के मरीजों का छत्तीसगढ़ में इलाज कोई नई बात नहीं है। पहले बीजू स्वास्थ्य कार्ड के लाभार्थी यहां जटिल बीमारियों का उपचार कराने आते थे। बाद में आयुष्मान योजना के तहत भी कई मरीजों ने यहां के निजी अस्पतालों पर भरोसा जताया। लेकिन योजना के नाम पर गैरजरूरी उपचार और ग्रामीण क्षेत्रों से मरीजों को कमीशन आधारित नेटवर्क के जरिए लाने के आरोप समय-समय पर उठते रहे हैं।
अब जब मामला राष्ट्रीय स्तर पर उठ चुका है, तो साफ है कि जांच की आंच छोटे अस्पतालों से लेकर पूरी व्यवस्था तक पहुंच सकती है। सवाल सिर्फ ओडिशा के मरीजों का नहीं, बल्कि आयुष्मान योजना की पारदर्शिता और विश्वसनीयता का है। यदि थोक सर्जरी के पीछे किसी तरह का संगठित पैटर्न पाया गया, तो कार्रवाई तय मानी जा रही है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जांच किस दिशा में बढ़ती है—क्या यह केवल डेटा विसंगति साबित होगी या फिर आयुष्मान के नाम पर चल रहे किसी बड़े खेल का पर्दाफाश? फिलहाल इतना तय है कि छत्तीसगढ़ के निजी अस्पतालों के लिए यह चेतावनी की घंटी है, और स्वास्थ्य तंत्र पर निगाहें पहले से कहीं ज्यादा तेज हो गई हैं।