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युद्ध के साए में धड़ाम हुआ बाजार, हफ्ते की शुरुआत में सेंसेक्स-निफ्टी पर जबरदस्त दबाव

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हफ्ते की पहली घंटी भारतीय शेयर बाजार के लिए किसी झटके से कम नहीं रही। सोमवार सुबह जैसे ही कारोबार शुरू हुआ, निवेशकों के चेहरों पर चिंता साफ दिखी। वैश्विक मंच पर मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव, ईरान-अमेरिका-इजरायल के बीच टकराव की खबरों और युद्ध जैसे हालात ने दुनिया भर के बाजारों में ‘रिस्क-ऑफ’ माहौल पैदा कर दिया। इसका सीधा असर घरेलू सूचकांकों पर पड़ा और बाजार भारी गिरावट के साथ खुला।

प्री-ओपनिंग सेशन में बिकवाली का दबाव इतना तीव्र था कि BSE Sensex करीब 7000 अंकों तक लुढ़क गया। बाद में कुछ संभलाव जरूर दिखा, लेकिन माहौल पूरी तरह नकारात्मक ही रहा। निवेशकों की पहली प्रतिक्रिया साफ थी—जोखिम से दूरी।

NIFTY 50 25,178.65 के पिछले बंद स्तर के मुकाबले 24,659.25 पर खुला। शुरुआती कारोबार में यह करीब 288 अंक फिसलकर 24,890 के आसपास ट्रेड करता नजर आया। वहीं सेंसेक्स 81,287.19 के मुकाबले 78,543.73 पर खुला और बाद में लगभग 1028 अंक गिरकर 80,258 के आसपास मंडराता दिखा। प्री-ओपनिंग में दोनों सूचकांकों में 2 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई थी, जो बाजार की बेचैनी का संकेत थी।

बाजार टूटने के पीछे सबसे बड़ा कारण भू-राजनीतिक तनाव रहा। मध्य-पूर्व में हालात बिगड़ने की आशंका से वैश्विक निवेशकों ने इक्विटी से दूरी बनानी शुरू कर दी। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए महंगा क्रूड सीधे महंगाई, चालू खाते के घाटे और कॉर्पोरेट मुनाफे पर दबाव बढ़ाता है। यही वजह रही कि सुरक्षित निवेश विकल्पों—जैसे डॉलर और सोना—की ओर झुकाव बढ़ा।

एशियाई और अमेरिकी बाजारों में कमजोरी पहले से ही दिख रही थी, और गिफ्ट निफ्टी ने सुबह-सुबह गिरावट का संकेत दे दिया था। ऐसे में घरेलू बाजार के लिए मजबूत शुरुआत की उम्मीद कम ही थी।

सेक्टोरल तस्वीर भी चिंताजनक रही। आईटी और बैंकिंग शेयरों में सबसे ज्यादा बिकवाली देखी गई, जिससे इंडेक्स पर अतिरिक्त दबाव बना। ऑटो और मेटल सेक्टर भी कमजोरी से नहीं बच पाए। हालांकि ऑयल एंड गैस शेयरों में मिला-जुला रुख रहा, क्योंकि ऊंचे क्रूड दाम कुछ कंपनियों के लिए फायदेमंद भी साबित हो सकते हैं।

रुपये पर भी दबाव के संकेत मिल रहे हैं। यदि कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो आयात बिल बढ़ेगा और मुद्रा बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। ऐसे में आने वाले सत्रों में निवेशकों की नजर सिर्फ कॉर्पोरेट नतीजों पर नहीं, बल्कि वैश्विक घटनाक्रम पर भी टिकी रहेगी।

फिलहाल बाजार का संदेश साफ है—अनिश्चितता के दौर में सतर्कता ही सबसे बड़ी रणनीति है। अगर भू-राजनीतिक तनाव कम नहीं हुआ, तो उतार-चढ़ाव का यह सिलसिला आगे भी जारी रह सकता है।

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