मध्य-पूर्व में बढ़ते युद्ध जैसे हालात के बीच दुनिया की निगाहें जिस एक समुद्री रास्ते पर टिकी हैं, वह है Strait of Hormuz। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ कहा है कि फिलहाल इस जलमार्ग को बंद करने की कोई योजना नहीं है। लेकिन विशेषज्ञ मान रहे हैं कि रास्ता खुला रहने के बावजूद तेल की कीमतों में उछाल का खतरा टला नहीं है।
हालिया घटनाक्रम में अमेरिकी हमले में Ali Khamenei की मौत के बाद आशंका जताई जा रही थी कि ईरान जवाबी रणनीति के तहत होर्मुज को बंद कर सकता है। अगर ऐसा होता, तो कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल से सीधे 120 डॉलर तक पहुंच सकती थी। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ता। हालांकि फिलहाल जलमार्ग खुला है, लेकिन बाजार में अनिश्चितता कायम है।
क्यों अब भी बना है खतरा?
पहला जोखिम तेल टैंकरों पर हमलों का है। भले ही आधिकारिक तौर पर रास्ता बंद न किया जाए, लेकिन अगर पर्शियन गल्फ के मुहाने पर जहाजों पर हमले जारी रहते हैं, तो शिपिंग कंपनियां इस रूट से दूरी बना सकती हैं। इससे सप्लाई बाधित होगी और कीमतें स्वतः बढ़ेंगी।
दूसरा कारण है इंश्योरेंस और शिपिंग लागत में उछाल। युद्ध जैसे माहौल में ‘वॉर रिस्क इंश्योरेंस’ महंगा हो जाता है। इसका बोझ अंततः तेल की कीमत में जुड़ता है।
तीसरा, बाजार की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया। ग्लोबल ट्रेडिंग भविष्य की आशंकाओं पर चलता है। जब तक तनाव पूरी तरह खत्म नहीं होता, क्रूड में तेजी बनी रह सकती है। विशेषज्ञ अब भी 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका जता रहे हैं।
आम लोगों पर क्या असर?
भारत अपनी जरूरत का करीब 90% कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें लगभग आधा हिस्सा होर्मुज मार्ग से आता है। यदि कीमतें बढ़ती हैं, तो पेट्रोल-डीजल में 4–5 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ोतरी संभव है। दिल्ली में पेट्रोल 95 रुपये से बढ़कर 100 रुपये के करीब और डीजल 88 से 92 रुपये तक जा सकता है।
हालांकि भारत में अंतिम खुदरा कीमत पर सरकार की अहम भूमिका होती है। तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय औसत कीमत और डॉलर-रुपया विनिमय दर के आधार पर बेस प्राइस तय करती हैं, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स अंतिम कीमत को तय करते हैं। सरकार चाहें तो टैक्स घटाकर राहत दे सकती है या कंपनियों को कीमतें स्थिर रखने का संकेत दे सकती है।
सोना-चांदी में तेज उछाल के संकेत
युद्ध और अस्थिरता के दौर में निवेशक सुरक्षित ठिकाने की तलाश करते हैं। कमोडिटी बाजार के जानकारों का मानना है कि सोना 1.60 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम से बढ़कर 1.90 लाख रुपये तक जा सकता है। चांदी भी 2.67 लाख रुपये प्रति किलो से 3.50 लाख तक पहुंच सकती है। यह ‘सेफ हेवन’ डिमांड का क्लासिक उदाहरण है।
शेयर बाजार पर दबाव
विश्लेषकों का मानना है कि तनाव बढ़ने की स्थिति में शेयर बाजार में 1 से 1.5 प्रतिशत तक की तात्कालिक गिरावट संभव है। ऑटोमोबाइल, बैंकिंग-फाइनेंस और एफएमसीजी सेक्टर पर ज्यादा दबाव रह सकता है। ऐसे समय में निवेशक इक्विटी से पैसा निकालकर सोना या सुरक्षित बॉन्ड में लगाते हैं।
होर्मुज इतना अहम क्यों?
करीब 167 किलोमीटर लंबा यह जलमार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के कुल पेट्रोलियम का लगभग 20% यहीं से गुजरता है। रोजाना 1.78 से 2.08 करोड़ बैरल कच्चा तेल इसी रास्ते से ट्रांजिट होता है। ईरान, सऊदी अरब, इराक और कुवैत जैसे देश अपने निर्यात के लिए इसी पर निर्भर हैं।
भारत के नॉन-ऑयल एक्सपोर्ट का भी 10% से ज्यादा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से जाता है, जिसमें बासमती चावल, चाय, मसाले और इंजीनियरिंग उत्पाद शामिल हैं।
क्या ईरान खुद नुकसान उठाएगा?
होर्मुज को बंद करना ईरान के लिए दोधारी तलवार साबित हो सकता है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव जरूर बनेगा, लेकिन ईरान का अपना तेल निर्यात भी रुक जाएगा। उसका सबसे बड़ा खरीदार चीन है; सप्लाई बाधित होने से रिश्तों पर असर पड़ सकता है।
विकल्प क्या हैं?
सऊदी अरब के पास ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ का विकल्प है, जो रेड सी टर्मिनल तक रोजाना करीब 50 लाख बैरल तेल पहुंचा सकती है। भारत भी खाड़ी देशों के बाहर से आयात बढ़ाने और अपने ‘स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व’ का उपयोग करने की तैयारी में है।
निष्कर्ष यही है कि भले ही होर्मुज फिलहाल बंद न हो, लेकिन युद्ध की आंच से ऊर्जा बाजार सुलग रहा है। तेल, सोना और शेयर बाजार—तीनों पर असर दिखना तय है। आने वाले हफ्ते वैश्विक राजनीति और बाजार दोनों के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।