इस वर्ष संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा में छत्तीसगढ़ के युवाओं ने शानदार प्रदर्शन करते हुए प्रदेश का नाम रोशन किया है। इस बार प्रदेश से कुल सात उम्मीदवारों ने सफलता हासिल की है, जिनमें रायपुर जिले के तीन अभ्यर्थी शामिल हैं। खास बात यह रही कि चयनित सभी अभ्यर्थियों के लक्ष्य शुरू से स्पष्ट थे और उन्होंने उसी दिशा में लगातार मेहनत की। कठिनाइयों, संघर्ष और असफलताओं के बावजूद उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी और अंततः देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक यूपीएससी को पास कर लिया। इन सफल अभ्यर्थियों ने अपनी यात्रा के अनुभव साझा करते हुए बताया कि किस तरह अनुशासन, धैर्य और परिवार के सहयोग ने उन्हें मंजिल तक पहुंचाया।
इस बार चयनित उम्मीदवारों में रायपुर की वैभवी अग्रवाल ने 35वां रैंक हासिल कर प्रदेश में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया। इसके अलावा दुर्ग के अनुभव अग्रवाल ने 188वां रैंक प्राप्त किया। मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले की दर्शना सिंह को 283वां रैंक मिला। धमतरी के डायमंड सिंह ध्रुव 623वें स्थान पर रहे। रायपुर के ही रौनक अग्रवाल को 772वां रैंक मिला। बीजापुर के अंकित सकनी ने 816वां स्थान प्राप्त किया जबकि महासमुंद जिले के संजय डहरिया ने 946वें रैंक के साथ यूपीएससी में सफलता हासिल की।
इनमें सबसे प्रेरणादायक कहानी महासमुंद जिले के बेलटुकरी गांव के रहने वाले संजय डहरिया की है। किसान परिवार से आने वाले संजय के लिए यह सफर बिल्कुल आसान नहीं था। संजय ने बताया कि यूपीएससी की तैयारी शुरू करने से पहले वे लगभग आठ वर्षों तक कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझते रहे। वर्ष 2012 में स्नातक की पढ़ाई के दौरान उनके कान के पास कैंसर का पता चला था। इसके बाद करीब आठ साल तक मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में उनका इलाज चलता रहा। इस बीमारी ने न केवल उनके शरीर को दर्द से तोड़ा बल्कि परिवार पर आर्थिक दबाव भी डाल दिया। उनके पिता लखन डहरिया एक साधारण किसान हैं और माता रेशम डहरिया ने भी बेटे के इलाज के लिए हर संभव प्रयास किया।
लगातार संघर्ष के बाद वर्ष 2019 में संजय कैंसर से पूरी तरह उबर पाए। इसके बाद उन्होंने तय किया कि अब वे जीवन में कुछ बड़ा करेंगे। वर्ष 2022 में उन्होंने रायपुर आकर यूपीएससी की तैयारी शुरू की। चौबे कॉलोनी में किराए के मकान में रहकर और नालंदा परिसर की लाइब्रेरी में रोज सुबह 8 बजे से रात 10 बजे तक लगातार पढ़ाई करते हुए चार वर्षों तक मेहनत की। आखिरकार उनके संघर्ष का फल मिला और वे यूपीएससी में चयनित हो गए। संजय की शुरुआती पढ़ाई गांव के सरकारी स्कूल में हुई थी। पांचवीं तक गांव में पढ़ाई करने के बाद उन्होंने नवोदय विद्यालय माना से बारहवीं तक शिक्षा प्राप्त की और फिर कला संकाय से स्नातक किया।
बीजापुर जिले के भैरमगढ़ के रहने वाले अंकित सकनी की कहानी भी संघर्ष और संकल्प की मिसाल है। साधारण किसान परिवार में जन्मे अंकित ने पांचवीं तक की पढ़ाई सरस्वती शिशु मंदिर भैरमगढ़ में की। इसके बाद जवाहर उत्कर्ष योजना के माध्यम से उन्हें बेहतर शिक्षा का अवसर मिला। आगे चलकर उन्होंने भिलाई इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और 2022 में पासआउट होने के बाद यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी। अंकित बताते हैं कि उनका सपना हमेशा से आईएएस बनने का रहा है। पिछले तीन वर्षों से उन्होंने ऑनलाइन गाइडेंस लेकर नियमित रूप से पढ़ाई की और रोजाना 9 से 10 घंटे तक अध्ययन किया। यूपीएससी में उन्होंने समाजशास्त्र विषय को चुना। वे उम्मीद कर रहे हैं कि उन्हें आईपीएस कैडर मिलेगा, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य आईएएस बनना है और इसके लिए वे आगे भी प्रयास जारी रखेंगे।
रायपुर की वैभवी अग्रवाल ने भी अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से बड़ी सफलता हासिल की है। केंद्रीय विद्यालय से स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने जेईई मेन्स परीक्षा पास की और आईआईटी बॉम्बे से एमटेक की पढ़ाई की। एमटेक के बाद उन्हें कई मल्टीनेशनल कंपनियों से लाखों रुपये के पैकेज वाले नौकरी के ऑफर मिले, लेकिन उन्होंने नौकरी करने के बजाय अपने सपने को चुनना बेहतर समझा। वर्ष 2023 से उन्होंने पूरी तरह यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी। तीसरे प्रयास में उन्होंने शानदार सफलता हासिल करते हुए 35वां रैंक प्राप्त किया।
वैभवी ने बताया कि शुरुआती दो प्रयासों में असफलता मिलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी कमजोरियों को पहचाना और उन्हें सुधारने के लिए लगातार मेहनत की। इंटरव्यू के दौरान उनसे एक दिलचस्प सवाल पूछा गया। उन्होंने छत्तीसगढ़ की ट्राइबल आर्ट डिजाइन वाली साड़ी पहनी हुई थी। इंटरव्यू पैनल के एक सदस्य ने उनसे पूछा कि साड़ी पर बना यह डिजाइन किस परंपरा से जुड़ा है। वैभवी ने बताया कि यह छत्तीसगढ़ की मुड़िया जनजाति की पारंपरिक कला से प्रेरित है। उनके इस जवाब से पैनल काफी प्रभावित हुआ। वैभवी की जिंदगी में एक बड़ा दुख भी रहा है। जब वे मात्र चार वर्ष की थीं तब उनकी मां प्रतिभा अग्रवाल का निधन हो गया था। इसके बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा और आज सफलता हासिल कर ली। वे भविष्य में महिलाओं के सशक्तिकरण और उनके अधिकारों के लिए काम करना चाहती हैं।
मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के जनकपुर की रहने वाली दर्शना सिंह ने भी यूपीएससी में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। उन्होंने 383वां रैंक प्राप्त कर प्रदेश का नाम रोशन किया। दर्शना सिंह की माता सीमा सिंह जनकपुर नगर पंचायत की पार्षद हैं जबकि उनके पिता अरुण सिंह किसान हैं। दर्शना की शुरुआती पढ़ाई गांव के स्कूल से ही हुई। उन्होंने बारहवीं कक्षा गणित विषय से पास की और इसके बाद जेईई के माध्यम से आईआईटी कानपुर में प्रवेश प्राप्त किया।
दर्शना बचपन से ही प्रशासनिक अधिकारी बनने का सपना देखती थीं। पांचवीं कक्षा में पढ़ते समय ही उन्होंने तय कर लिया था कि वे सिविल सेवा में जाएंगी। बीटेक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे दिल्ली चली गईं और वहां यूपीएससी की तैयारी शुरू कर दी। उनका मानना है कि मुख्य परीक्षा तक किताबों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। इंटरव्यू की तैयारी के लिए उन्होंने अपने माता-पिता, शिक्षकों और दोस्तों से लगातार चर्चा की। साथ ही अपने गांव, जिले और प्रदेश से जुड़ी जानकारी को भी गहराई से समझने की कोशिश की। दर्शना फिलहाल आईपीएस प्रशिक्षण के साथ आगे आईएएस बनने के लिए एक और प्रयास करने की योजना बना रही हैं।
इस तरह छत्तीसगढ़ के इन सात युवाओं ने न केवल प्रदेश का मान बढ़ाया है बल्कि यह भी साबित किया है कि सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत लगातार की जाए तो सफलता जरूर मिलती है। इन युवाओं की कहानियां हजारों विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा बन रही हैं और यह संदेश देती हैं कि सपनों को पूरा करने के लिए धैर्य, अनुशासन और समर्पण सबसे जरूरी होते हैं।