छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने टोनही प्रताड़ना केस में अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस संजय एस अग्रवाल ने सेशन कोर्ट के आरोपियों को बरी करने के फैसले को सही मानते हुए पीड़िता की अपील खारिज कर दी है। कोर्ट ने टिप्पणी में कहा कि शिकायत दर्ज करने में देरी, गवाहों के बयानों में विरोधाभास और जमीन विवाद की पृष्ठभूमि के कारण केस संदेहास्पद बन गया। किसी भी केस में FIR में देरी का स्पष्ट कारण होना अनिवार्य है। मामला बलरामपुर-रामानुजगंज जिले से जुड़ा हुआ है। जहां जमीनी विवाद दंपती ने टोनही बताकर महिला के साथ गाली-गलौज और मारपीट की थी। पीड़ित की शिकायत पर दंपती के खिलाफ केस दर्ज किया गया था। प्रथम श्रेणी न्यायालय ने दंपती को दोषी पाया। इसके बाद उन्होंने इस फैसले को सेशन कोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए दोनों आरोपियों को बरी किया। ऐसे में पीड़ित ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
जिस पर हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
जानिए क्या है पूरा मामला ?
दरअसल, बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के शंकरगढ़ थाना क्षेत्र की महिला ने 26 अगस्त 2012 को शिकायत दर्ज कराई। आरोप लगाया गया कि 8 अगस्त 2012 की सुबह करीब 11 बजे रामलाल यादव अपनी पत्नी फूलकुमारी के साथ उसके घर आए।
उसे टोनही कहकर (जादू-टोना करने वाली) गाली-गलौज की और जान से मारने की धमकी दी। पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 294, 506 भाग-2 और छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2005 की धारा 4, 5 के तहत मामला दर्ज किया।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सजा, सत्र न्यायालय ने पलटा
पुलिस जांच और आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद कोर्ट में चालान पेश किया गया। ट्रायल में गवाहों के बयान और तथ्यों के आधार पर राजपुर के प्रथम श्रेणी न्यायालय ने 28 मार्च 2019 को रामलाल यादव को धारा 506 भाग-2 आईपीसी और टोनही प्रताड़ना अधिनियम के तहत दोषी ठहराया।
जबकि उसकी पत्नी फूलकुमारी को टोनही प्रताड़ना अधिनियम के तहत दोषी माना। आरोपियों ने फैसला सत्र न्यायालय में चुनौती दी। सत्र न्यायालय बलरामपुर (रामानुजगंज) ने 14 सितंबर 2021 को ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए दोनों आरोपियों को बरी किया।
पीड़ित महिला ने हाईकोर्ट में अपील दर्ज की
सत्र न्यायालय के फैसले के खिलाफ शिकायतकर्ता महिला ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 372 के तहत हाईकोर्ट में अपील दायर की। कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर सही फैसला सुनाया, जबकि सत्र न्यायालय ने गवाहों के बयानों का सही मूल्यांकन नहीं किया।
हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के फैसले की पुष्टि की
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण किया। पता चला कि कथित घटना 8 अगस्त 2012 को हुई, लेकिन शिकायत 26 अगस्त 2012 को दर्ज कराई गई। देरी का संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं हुआ।
कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता और उसके पति के बयानों में कई विरोधाभास हैं। शिकायतकर्ता ने कहा कि 13 अगस्त 2012 को पुलिस अधीक्षक कार्यालय गई, जबकि बयान के अन्य हिस्से में इनकार किया।
पति ने कहा कि दोनों उस दिन एसपी कार्यालय गए, लेकिन कोई दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया। गवाहों के बयानों से पता चला कि शिकायतकर्ता के पति और आरोपी रामलाल यादव के बीच पहले से जमीन विवाद चल रहा था।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सत्र न्यायालय की ओर से आरोपियों को बरी करने का निर्णय उचित है और उसमें हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।