भारत और United States के बीच होने वाली बहुप्रतीक्षित अंतरिम ट्रेड डील फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है। मार्च में साइन होने की उम्मीद इस समझौते पर अब अनिश्चितता के बादल छा गए हैं। वजह बना है Supreme Court of the United States का हालिया फैसला, जिसने पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump की उस ताकत को ही खत्म कर दिया, जिसके दम पर अमेरिका दुनिया भर के देशों पर मनमाने टैरिफ थोप रहा था।
दरअसल, कोर्ट ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट यानी IEEPA के तहत लगाए गए कई टैरिफ को अवैध मानते हुए रद्द कर दिया। यही वो कदम था, जिसने भारत-अमेरिका ट्रेड बातचीत की पूरी दिशा बदल दी। अब अमेरिका को एक नया ग्लोबल टैरिफ स्ट्रक्चर तैयार करना पड़ेगा, और जब तक यह ढांचा सामने नहीं आता, तब तक कोई भी बड़ा समझौता साइन होना मुश्किल माना जा रहा है।
यही कारण है कि भारत ने भी साफ कर दिया है कि वह जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाएगा। सूत्रों के मुताबिक, नई डील तभी साइन होगी जब अमेरिका का नया टैरिफ आर्किटेक्चर स्पष्ट हो जाएगा और भारत को उसमें प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले बेहतर बाजार लाभ मिलता नजर आएगा। यानी अब यह डील केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि रणनीतिक फैसलों का हिस्सा बन चुकी है।
इस बीच, अमेरिका ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर Trade Act of 1974 Section 122 के तहत सभी देशों पर 10% का अस्थायी टैरिफ लागू कर दिया है, जो अगले पांच महीनों तक प्रभावी रह सकता है। इसका सीधा असर वैश्विक व्यापार संतुलन पर पड़ सकता है, और भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा।
भारत की ओर से पहले कुछ चुनिंदा प्रोडक्ट्स पर 18% तक रेसिप्रोकल टैरिफ की योजना बनाई गई थी, लेकिन अब ये दरें भी अमेरिका के नए ढांचे पर निर्भर करेंगी। यानी आने वाले समय में टैरिफ की पूरी गणित बदल सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि जहां Malaysia जैसे देशों को अमेरिकी कोर्ट के फैसले के बाद अपने साइन किए गए समझौते से पीछे हटना पड़ा, वहीं भारत ने अभी तक केवल फ्रेमवर्क स्तर पर ही बातचीत की है। इससे भारत को रणनीतिक लचीलापन मिला है, और यही वजह है कि वह बदलते हालात के अनुसार अपने फैसले को ढाल सकता है।
टैरिफ के अलावा, दोनों देश नॉन-टैरिफ बैरियर्स और सेक्शन 232 जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी बातचीत कर रहे हैं। वहीं Section 301 investigation को लेकर भी भारत सरकार सतर्क है और कानूनी पहलुओं का गहराई से अध्ययन कर रही है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारत के कॉमर्स सेक्रेटरी Rajesh Agrawal ने भरोसा जताया है कि तमाम वैश्विक चुनौतियों के बावजूद देश का एक्सपोर्ट इस वित्त वर्ष में 860 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। हालांकि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और लॉजिस्टिक्स बाधाएं इसमें थोड़ी रुकावट जरूर डाल सकती हैं।
कुल मिलाकर, भारत-अमेरिका ट्रेड डील अब सिर्फ एक समझौता नहीं रही, बल्कि यह वैश्विक आर्थिक ताकतों के बीच चल रही रणनीतिक जंग का हिस्सा बन गई है। आने वाले महीनों में अमेरिका का नया टैरिफ ढांचा तय करेगा कि यह डील भारत के लिए फायदे का सौदा बनेगी या फिर एक और लंबा इंतजार।