छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित बिलासपुर नसबंदी कांड में आखिरकार 11 साल से ज्यादा लंबे इंतजार के बाद अदालत का फैसला सामने आ गया है। इस मामले ने कभी पूरे देश को झकझोर दिया था और अब न्यायालय ने सर्जन डॉ. आरके गुप्ता को दोषी ठहराते हुए उन्हें 2 साल की सजा और 25 हजार रुपये जुर्माने से दंडित किया है। अदालत ने साफ माना कि सीमित समय में अत्यधिक ऑपरेशन करने और लापरवाही बरतने के कारण यह दर्दनाक हादसा हुआ।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि ऑपरेशन के दौरान अपनाई गई प्रक्रियाओं में गंभीर खामियां थीं, जिनकी वजह से महिलाओं की जान चली गई। इसके अलावा डॉ. गुप्ता को अन्य धाराओं में भी सजा सुनाई गई है, जिसमें 6 महीने और 1 महीने की अतिरिक्त सजा शामिल है। हालांकि, दवा आपूर्ति से जुड़े पांच अन्य आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया, जिससे इस मामले का एक बड़ा पहलू अधूरा ही रह गया।
यह मामला नवंबर 2014 का है, जब सकरी क्षेत्र के नेमिचंद्र जैन अस्पताल समेत कई स्थानों पर सरकारी नसबंदी शिविर आयोजित किए गए थे। इन शिविरों में बड़ी संख्या में महिलाओं का ऑपरेशन किया गया, लेकिन ऑपरेशन के बाद उनकी तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। 100 से ज्यादा महिलाओं को अस्पतालों में भर्ती कराया गया और अंततः 15 महिलाओं की मौत हो गई। इस घटना ने पूरे प्रदेश ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी हड़कंप मचा दिया था।
शुरुआती जांच में सामने आया कि ऑपरेशन के दौरान इस्तेमाल किए गए उपकरणों की सही तरीके से सफाई नहीं की गई थी, जिससे संक्रमण फैल गया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में सेप्टिसिमिया और सेप्टिक शॉक को मौत का कारण बताया गया, जो आमतौर पर अस्वच्छ वातावरण और संक्रमित उपकरणों के कारण होता है। बाद में दवाओं में जहर मिलने का दावा भी किया गया, लेकिन यह पहलू जांच में साबित नहीं हो सका।
दवा कंपनियों पर लगे आरोप भी समय के साथ कमजोर पड़ गए। फॉरेंसिक जांच और लैब रिपोर्ट्स में जहर की पुष्टि नहीं हुई, जिससे अभियोजन पक्ष का केस कमजोर हो गया। अदालत में यह साबित नहीं हो सका कि दवा आपूर्ति से जुड़े अन्य आरोपियों की इस घटना में सीधी भूमिका थी, जिसके चलते उन्हें संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया गया।
इस मामले ने देश की स्वास्थ्य व्यवस्था, खासकर सरकारी शिविरों में होने वाली प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। एक ही दिन में बड़ी संख्या में ऑपरेशन करना और सुरक्षा मानकों की अनदेखी करना किस हद तक खतरनाक हो सकता है, यह इस घटना से साफ हो गया था।
करीब एक दशक बाद आया यह फैसला पीड़ित परिवारों के लिए आंशिक न्याय जरूर लेकर आया है, लेकिन कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। क्या इस फैसले से भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लग पाएगी, या फिर सिस्टम की खामियां फिर किसी और त्रासदी को जन्म देंगी—यह देखना बाकी है।