देश के सबसे बड़े निजी बैंक HDFC Bank में अचानक आए घटनाक्रम ने बाजार को झकझोर दिया है। बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन Atanu Chakraborty के इस्तीफे के बाद गुरुवार को शेयर में करीब 5% की तेज गिरावट दर्ज की गई और यह लगभग 800 रुपए के आसपास ट्रेड करने लगा। इस साल अब तक बैंक का स्टॉक करीब 20% तक टूट चुका है, जिससे निवेशकों की चिंता और गहरी हो गई है।
अतनु चक्रवर्ती ने अपने इस्तीफे में बैंक के कामकाज और आंतरिक संस्कृति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि पिछले दो वर्षों में उन्होंने बैंक के भीतर ऐसी कई प्रथाएं और घटनाएं देखीं, जो उनके व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिकता के अनुरूप नहीं थीं। हालांकि उन्होंने किसी खास मामले का जिक्र नहीं किया, लेकिन इस बयान ने बाजार में गवर्नेंस को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
इस अचानक बदलाव के बाद बैंक ने तुरंत कदम उठाते हुए Keki Mistry को 19 मार्च से तीन महीने के लिए अंतरिम चेयरमैन नियुक्त किया है। केकी मिस्त्री बैंकिंग सेक्टर के अनुभवी चेहरे माने जाते हैं और पहले HDFC लिमिटेड में वाइस चेयरमैन और CEO की भूमिका निभा चुके हैं। उन्होंने कार्यभार संभालते ही निवेशकों को भरोसा दिलाया कि बैंक पूरी तरह स्थिर है और चिंता की कोई बड़ी बात नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम पर Reserve Bank of India ने भी प्रतिक्रिया दी है। आरबीआई ने स्पष्ट किया कि बैंक की ओर से मांगी गई अस्थायी व्यवस्था को मंजूरी दे दी गई है और फिलहाल HDFC बैंक की वित्तीय स्थिति मजबूत बनी हुई है। बैंक एक ‘सिस्टेमिकली इम्पोर्टेंट’ संस्था है, जिसके पास पर्याप्त पूंजी और लिक्विडिटी मौजूद है। केंद्रीय बैंक ने यह भी कहा कि बैंक के गवर्नेंस या कामकाज को लेकर इस समय कोई गंभीर चिंता की बात नहीं है।
गौरतलब है कि अतनु चक्रवर्ती 1985 बैच के रिटायर्ड IAS अधिकारी हैं और अप्रैल 2021 में उन्हें HDFC बैंक का चेयरमैन बनाया गया था। हाल ही में उनका कार्यकाल मई 2027 तक बढ़ाया गया था। उनके कार्यकाल के दौरान ही HDFC लिमिटेड का बैंक में ऐतिहासिक विलय हुआ, जिससे यह देश का दूसरा सबसे बड़ा बैंक बना। हालांकि चक्रवर्ती ने यह भी संकेत दिया कि इस मर्जर के पूरे फायदे अभी सामने आना बाकी हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि बैंकिंग सेक्टर में “भरोसा” सबसे बड़ी पूंजी होती है। भले ही आरबीआई और बैंक मैनेजमेंट ने स्थिति को स्थिर बताया हो, लेकिन जब तक गवर्नेंस से जुड़े सवालों पर पूरी पारदर्शिता नहीं आती, तब तक बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।