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हजार रुपये बकाया पर बिजली काटने पर बवाल: आयोग सख्त, पॉवर कंपनी से मांगा पूरा हिसाब

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छत्तीसगढ़ में बिजली कटौती को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। Chhattisgarh State Power Company द्वारा मामूली बकाया, यहां तक कि हजार रुपये तक के बिल पर भी उपभोक्ताओं की बिजली काटे जाने के मामलों ने तूल पकड़ लिया है। इस पर सख्त रुख अपनाते हुए Chhattisgarh Electricity Regulatory Commission ने न केवल हस्तक्षेप किया है, बल्कि अगली सुनवाई तक किसी भी उपभोक्ता का कनेक्शन काटने पर रोक भी लगा दी है।

कंपनी ने आयोग के नोटिस के जवाब में अपना पक्ष जरूर रखा, लेकिन वह आयोग को संतुष्ट नहीं कर पाया। अब आयोग ने साफ तौर पर निर्देश दिया है कि पूरी प्रक्रिया का लिखित विवरण दिया जाए—किन उपभोक्ताओं का कनेक्शन काटा गया, किस आधार पर और किन नियमों के तहत यह कार्रवाई की गई।

सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हुआ है कि क्या कार्रवाई सिर्फ छोटे बकायेदारों तक सीमित है, या फिर बड़े और प्रभावशाली बकायेदारों पर भी समान रूप से लागू की जा रही है। आयोग ने इस बिंदु पर विशेष रूप से जवाब मांगा है, क्योंकि शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं कि आम उपभोक्ताओं पर सख्ती दिखाई जा रही है, जबकि बड़े बकायेदारों के मामलों में ढिलाई बरती जा रही है।

पॉवर कंपनी का तर्क है कि नियमानुसार बिल की अंतिम तिथि के 15 दिन बाद कनेक्शन काटने का प्रावधान है। लेकिन शिकायतों में यह भी सामने आया है कि कई मामलों में अंतिम तिथि खत्म होने से पहले ही या फिर 15 दिन की निर्धारित अवधि का इंतजार किए बिना बिजली काट दी गई। यही बात आयोग को सबसे ज्यादा खटक रही है और इसी कारण उसने इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया है।

आयोग के सामने यह भी आरोप आए हैं कि कुछ रसूखदार उपभोक्ताओं—जिनमें जनप्रतिनिधि और वरिष्ठ अधिकारी शामिल बताए जा रहे हैं—पर भारी बकाया होने के बावजूद उनकी बिजली नहीं काटी गई। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या नियम सबके लिए समान हैं या फिर आम लोगों और प्रभावशाली लोगों के लिए अलग-अलग मापदंड अपनाए जा रहे हैं।

आयोग के सचिव S P Shukla ने स्पष्ट किया है कि कंपनी से विस्तृत जानकारी मांगी गई है। इसमें यह भी पूछा गया है कि कनेक्शन काटने का आधार क्या है, कितने बड़े बकायेदारों पर कार्रवाई हुई है और भुगतान के बाद कितने समय में कनेक्शन दोबारा जोड़ा जा रहा है।

पहली सुनवाई में कंपनी का पक्ष सुनने के बाद आयोग ने यह साफ संकेत दे दिया है कि अब बिना पारदर्शिता और तय प्रक्रिया के कोई भी कार्रवाई स्वीकार नहीं की जाएगी। आने वाली सुनवाई में कंपनी को हर सवाल का स्पष्ट जवाब देना होगा, वरना इस मामले में और कड़ी कार्रवाई भी हो सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सिस्टम में समानता और पारदर्शिता वास्तव में लागू हो रही है या नहीं। फिलहाल, आम उपभोक्ताओं को राहत जरूर मिली है, लेकिन आगे का फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि पॉवर कंपनी आयोग के सवालों का कितना संतोषजनक जवाब दे पाती है।

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