अंतरराष्ट्रीय हालात में थोड़ी नरमी के संकेत मिलते ही भारतीय मुद्रा ने राहत की सांस ली है। 24 मार्च को रुपया मजबूती के साथ खुला और डॉलर के मुकाबले करीब 34 पैसे चढ़कर 93.64 के स्तर पर पहुंच गया। यह उछाल ऐसे समय में आया है जब पिछले कारोबारी सत्र में रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 93.98 पर बंद हुआ था। यानी बाजार में आई यह तेजी फिलहाल राहत जरूर दे रही है, लेकिन स्थिति अभी पूरी तरह स्थिर नहीं मानी जा सकती।
इस मजबूती के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का हालिया बयान माना जा रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका ईरान के ऊर्जा ढांचे पर संभावित हमलों को फिलहाल पांच दिनों के लिए टाल रहा है और इस दौरान बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की जाएगी। इस खबर ने वैश्विक बाजार में सकारात्मक माहौल बनाया और निवेशकों के बीच थोड़ी स्थिरता लौटी।
ट्रंप के इस संकेत का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर भी देखने को मिला। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत, जो हाल ही में 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, गिरकर करीब 100 डॉलर के आसपास आ गई। तेल की कीमतों में यह गिरावट भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए राहत की खबर है, क्योंकि इससे आयात बिल कम होने की उम्मीद बढ़ती है और रुपये को सपोर्ट मिलता है।
हालांकि, यह राहत अभी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। मध्य-पूर्व में तनाव की स्थिति अभी भी बनी हुई है और खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अनिश्चितता बरकरार है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने पहले ही वैश्विक बाजार को अस्थिर कर रखा है, और अगर हालात फिर बिगड़ते हैं तो इसका सीधा असर तेल की कीमतों और रुपये दोनों पर पड़ सकता है।
मार्केट विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल बाजार ने इस अस्थायी युद्धविराम संकेत का स्वागत किया है, लेकिन निवेशकों का भरोसा पूरी तरह बहाल नहीं हुआ है। अगर आने वाले दिनों में तनाव और कम होता है, तो रुपये में और मजबूती देखने को मिल सकती है। वहीं, यदि हालात फिर बिगड़ते हैं और तेल की कीमतें दोबारा उछाल लेती हैं, तो रुपये पर दबाव बढ़ना तय है।
कुल मिलाकर, रुपये की यह मजबूती फिलहाल एक राहत भरी खबर जरूर है, लेकिन इसकी आगे की दिशा पूरी तरह वैश्विक घटनाक्रम पर निर्भर करेगी। खासकर मध्य-पूर्व की स्थिति और कच्चे तेल की कीमतें ही तय करेंगी कि यह राहत स्थायी बनेगी या फिर बाजार एक बार फिर दबाव में आ जाएगा।