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गैस संकट से उद्योग बेहाल—छत्तीसगढ़ में MSME से लेकर स्टील प्लांट तक ठप होने की कगार पर

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छत्तीसगढ़ में गैस सिलेंडर की कमी अब सिर्फ घरेलू परेशानी नहीं रही, बल्कि यह औद्योगिक संकट का रूप लेती जा रही है। रायपुर समेत पूरे प्रदेश में लघु उद्योग (MSME), मिनी स्टील प्लांट, रोलिंग मिल और स्पंज आयरन उद्योगों का काम बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि कई जगह कटिंग और वेल्डिंग जैसे जरूरी काम तक रोकने पड़ रहे हैं।

उद्योगों से जुड़े लोगों का कहना है कि वर्तमान में उन्हें एक भी कमर्शियल गैस सिलेंडर उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। नतीजतन उत्पादन पर सीधा असर पड़ा है और कई यूनिट्स में काम 25 से 30 प्रतिशत तक घट चुका है। अगर जल्द ही स्थिति नहीं सुधरी, तो आधे से ज्यादा उत्पादन ठप होने का खतरा है और कई उद्योगों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ सकता है।

इस संकट का सबसे बड़ा असर इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े छोटे उद्योगों पर पड़ रहा है, जहां गैस सिलेंडर कटिंग और वेल्डिंग के लिए जरूरी होता है। मिनी स्टील प्लांट और रोलिंग मिलों में भी सरिया बनाने के लिए बिलेट कटिंग में गैस की अहम भूमिका होती है। ऐसे में सिलेंडर की कमी ने पूरे उत्पादन चक्र को धीमा कर दिया है।

उद्योग संगठनों के अनुसार, एक छोटे उद्योग को हर महीने 15 से 25 सिलेंडर की जरूरत होती है, जबकि बड़े प्लांट्स में यह खपत और ज्यादा होती है। प्रदेश में करीब 150 रोलिंग मिल, 120 मिनी स्टील प्लांट और 70 स्पंज आयरन यूनिट्स के साथ हजारों MSME इकाइयां हैं, जो इस समय गैस संकट से जूझ रही हैं।

हालांकि केंद्र सरकार ने कॉमर्शियल गैस की सप्लाई बढ़ाने का फैसला किया है, लेकिन इसका असर अभी तक जमीनी स्तर पर नजर नहीं आ रहा। यही वजह है कि उद्योगों को मजबूरी में ब्लैक मार्केट का सहारा लेना पड़ रहा है। जहां एक सिलेंडर की तय कीमत करीब 2100 रुपये है, वहीं ब्लैक में इसकी कीमत 4000 से 5000 रुपये तक पहुंच गई है। इससे उत्पादन लागत भी तेजी से बढ़ रही है।

अगर यही स्थिति बनी रही, तो इसका असर सिर्फ उद्योगों तक सीमित नहीं रहेगा। प्रदेश सरकार को राजस्व में नुकसान होगा और हजारों लोगों की रोजी-रोटी पर भी संकट खड़ा हो सकता है। उद्योग संगठनों ने सरकार से तुरंत हस्तक्षेप कर सप्लाई सुचारू करने की मांग की है, ताकि उत्पादन और रोजगार दोनों को बचाया जा सके।

कुल मिलाकर, गैस सिलेंडर की यह किल्लत अब आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करने लगी है और अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो इसका असर पूरे औद्योगिक ढांचे पर पड़ सकता है।

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