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“फिल्म, राजनीति और सोशल मीडिया विवाद: अनीत पड्डा की बहन के बयान से छिड़ी नई बहस”

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फिल्म और राजनीति के मेल पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। एक्ट्रेस अनीत पड्डा की बहन रीत के हालिया बयान ने सोशल मीडिया पर नया विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने फिल्म धुरंधर 2 को लेकर तीखी टिप्पणी करते हुए इसे एक “प्रोपेगैंडा” फिल्म बताया, जिसके बाद यह मुद्दा तेजी से वायरल हो गया।

दरअसल, रीत ने यह प्रतिक्रिया उस समय दी जब एक सोशल मीडिया यूजर ने उनके पुराने पोस्ट और राजनीतिक मुद्दों पर उनके रुख को लेकर सवाल उठाया। आमतौर पर सार्वजनिक बहस से दूर रहने वाली रीत ने इस बार खुलकर जवाब देने का फैसला किया और कई मुद्दों पर अपनी राय रखी।

रीत के मुताबिक, धुरंधर 2 में सरकार के पक्ष में एक खास नैरेटिव पेश किया गया है और फिल्म के जरिए नोटबंदी जैसे फैसलों को सही ठहराने की कोशिश की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ फिल्में राजनीतिक संदेश देने के लिए आंकड़ों और घटनाओं को एकतरफा तरीके से पेश करती हैं।

इसी क्रम में उन्होंने द कश्मीर फाइल्स और द केरल स्टोरी जैसी फिल्मों का भी जिक्र किया और आरोप लगाया कि इनमें दिखाए गए आंकड़े बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं, जिससे एक विशेष समुदाय के खिलाफ माहौल बनाया जाता है। रीत का मानना है कि सिनेमा को किसी भी तरह के विभाजनकारी नैरेटिव का हिस्सा नहीं बनना चाहिए।

उन्होंने फिल्म पंजाब ’95 का उदाहरण देते हुए यह भी कहा कि जो फिल्में अलग दृष्टिकोण दिखाने की कोशिश करती हैं, उन्हें रिलीज के दौरान मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इस टिप्पणी ने फिल्म इंडस्ट्री में सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर एक नई चर्चा छेड़ दी है।

रीत ने सिर्फ फिल्मों तक ही अपनी बात सीमित नहीं रखी, बल्कि उन्होंने ग्लोबल मंच पर भी सवाल उठाए। उन्होंने प्रियंका चोपड़ा के ऑस्कर समारोह में युद्ध जैसे संवेदनशील मुद्दे पर चुप रहने की आलोचना की। उनके अनुसार, ऐसे बड़े मंच पर मौजूद सार्वजनिक हस्तियों को सामाजिक और वैश्विक मुद्दों पर अपनी राय रखनी चाहिए।

हालांकि, इस बयान के बाद रीत को सोशल मीडिया पर आलोचना और ट्रोलिंग का सामना भी करना पड़ा। बढ़ते विवाद के बीच उन्होंने अपना इंस्टाग्राम अकाउंट प्राइवेट कर लिया। इसके बावजूद उन्होंने साफ किया कि उनका विरोध किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि उस सोच से है जो राजनीति में धर्म को शामिल कर समाज में तनाव पैदा करती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कलाकारों और सार्वजनिक हस्तियों को राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर खुलकर बोलना चाहिए या नहीं। साथ ही यह भी बहस छिड़ गई है कि सिनेमा और विचारधारा के बीच की सीमा आखिर कहां तय होती है।

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