छत्तीसगढ़ में इन दिनों शक्कर की भारी कमी ने आम लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। हालात ऐसे बन गए हैं कि राशन कार्डधारियों में से 60 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को अब तक शक्कर नहीं मिल पाई है। सरकारी कोटे के मुकाबले राशन दुकानों में 40 प्रतिशत से भी कम शक्कर का भंडारण हो सका है, जिससे वितरण व्यवस्था पूरी तरह प्रभावित नजर आ रही है।
नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारियों का कहना है कि जितनी मात्रा में कारखानों से शक्कर मिल रही है, उसी के अनुसार राशन दुकानों में सप्लाई की जा रही है। हालांकि इस बार कारखानों से उत्पादन और आपूर्ति दोनों ही काफी कम रही है, जिससे यह संकट गहराता चला गया।
इस समस्या की जड़ में प्रदेश के सहकारी शक्कर कारखानों की खराब आर्थिक स्थिति भी है। पिछले तीन वर्षों में इन कारखानों को करीब 267 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ है। औसतन हर साल लगभग 89 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा है। ऐसे में उत्पादन तो हो रहा है, लेकिन लाभ के बजाय नुकसान लगातार बढ़ता जा रहा है।
अंबिकापुर का मां महामाया सहकारी शक्कर कारखाना इस संकट की एक बड़ी मिसाल बनकर सामने आया है। यहां गन्ने की बेहद कम आवक के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ है और हालात इतने खराब हो गए हैं कि कर्मचारियों को वेतन तक समय पर नहीं मिल पा रहा। स्थिति यह है कि प्रबंधन को कर्मचारियों की वेतन राशि से किसानों का भुगतान करना पड़ रहा है, जिससे तीन महीने से कर्मचारियों का वेतन अटका हुआ है।
गन्ने की कमी इस पूरे संकट की सबसे बड़ी वजह बनकर उभरी है। कारखानों में जिस कीमत पर गन्ना खरीदा जा रहा है, उससे ज्यादा दाम खुले बाजार में मिल रहा है। यही कारण है कि किसान सहकारी कारखानों को गन्ना बेचने के बजाय बाजार में बेचने को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसका सीधा असर उत्पादन और सप्लाई दोनों पर पड़ा है।
उधर बिलासपुर और आसपास के इलाकों में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। भोरमदेव शक्कर कारखाने से सप्लाई में देरी के कारण जिले की कई राशन दुकानों में शक्कर पहुंच ही नहीं पाई है। लोग राशन लेने पहुंचते हैं, लेकिन खाली हाथ लौटने को मजबूर हैं। हालांकि अधिकारियों का दावा है कि अब सप्लाई धीरे-धीरे सामान्य हो रही है और जल्द ही सभी दुकानों में शक्कर पहुंचा दी जाएगी।
प्रदेश में कुल 697 राशन दुकानों में से 675 दुकानों तक शक्कर पहुंच चुकी है, लेकिन अभी भी कई दुकानों में वितरण बाकी है। अधिकारियों के अनुसार एक-दो दिनों में यह कमी पूरी कर ली जाएगी, लेकिन तब तक लोगों को इंतजार करना पड़ रहा है।
इस पूरे मामले ने सरकारी वितरण प्रणाली की कई कमजोरियों को उजागर कर दिया है—चाहे वह कारखानों की वित्तीय हालत हो, किसानों की प्राथमिकताएं हों या फिर भुगतान व्यवस्था में देरी। अब सवाल यह है कि क्या आने वाले समय में सरकार इस संकट का स्थायी समाधान निकाल पाएगी या फिर हर साल इसी तरह की स्थिति दोहराई जाएगी।