Meta Pixel

तेल की आग से झुलस सकती है भारतीय अर्थव्यवस्था: ग्रोथ घटने और महंगाई बढ़ने का खतरा

Spread the love

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने सिर्फ भू-राजनीतिक हालात ही नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी हिला कर रख दिया है। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ रहा है, जहां कच्चे तेल की कीमतों में उछाल एक बड़े आर्थिक खतरे के रूप में उभर रहा है। ताजा आकलनों के मुताबिक, अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो भारत की विकास दर पर गंभीर असर पड़ सकता है।

ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म Morgan Stanley की रिपोर्ट ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि कच्चा तेल एक तिमाही तक 150 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच जाता है, तो वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की जीडीपी ग्रोथ घटकर करीब 5.7% तक आ सकती है। यह गिरावट महामारी के बाद सबसे धीमी आर्थिक रफ्तार मानी जाएगी।

सिर्फ ग्रोथ ही नहीं, महंगाई भी इस स्थिति में बड़ा सिरदर्द बन सकती है। अनुमान है कि महंगाई दर Reserve Bank of India की तय सीमा 6% को पार कर सकती है। साथ ही चालू खाता घाटा भी बढ़कर जीडीपी के लगभग 3% तक पहुंच सकता है, जो आर्थिक स्थिरता के लिए खतरे की घंटी है।

हालांकि, बेस केस में भी तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं है। रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2027 के लिए भारत की विकास दर का अनुमान 6.5% से घटाकर 6.2% कर दिया गया है, जबकि महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.1% कर दिया गया है। यह आकलन इस आधार पर है कि ब्रेंट क्रूड औसतन 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहेगा। फिलहाल बाजार में कीमतें 111 डॉलर के पार चल रही हैं, जिसका मुख्य कारण ईरान और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास बढ़ता तनाव है।

तेल की बढ़ती कीमतें अर्थव्यवस्था पर कई स्तरों पर असर डालती हैं। सबसे पहले, ऊर्जा और कच्चे माल की लागत बढ़ जाती है, जिससे उद्योगों की उत्पादन लागत में इजाफा होता है। दूसरा, महंगाई बढ़ने से आम लोगों की क्रय शक्ति कमजोर होती है और बाजार में मांग घटने लगती है। तीसरा, निर्यात पर भी दबाव पड़ता है, जिससे विदेशी व्यापार संतुलन बिगड़ सकता है।

भारत सरकार का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026 में अर्थव्यवस्था 7.6% की दर से बढ़ सकती है, लेकिन वैश्विक एजेंसियां अब इस आउटलुक को लेकर सतर्क नजर आ रही हैं। Moody’s Ratings का अनुमान है कि 2027 तक यह दर घटकर करीब 6% रह सकती है। वहीं OECD ने भी अपने अनुमान में कटौती करते हुए इसे 6.1% कर दिया है।

महंगाई के मोर्चे पर भी खतरा कम नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, थोक महंगाई यानी WPI में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है। अगर तेल की कीमतें 95 डॉलर के आसपास बनी रहती हैं, तो WPI महंगाई 7% तक पहुंच सकती है, जो फिलहाल 1% से भी कम स्तर पर है।

इन चुनौतियों के बीच यह भी अनुमान है कि RBI अपनी नीतिगत ब्याज दर को 5.25% पर स्थिर रख सकता है। हालांकि, सरकार को हालात संभालने के लिए सब्सिडी बढ़ाने या टैक्स में कटौती जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं। इससे राजकोषीय घाटा तय लक्ष्य 4.3% से बढ़कर 0.3 से 0.5% ज्यादा हो सकता है।

कुल मिलाकर, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल भारत के लिए सिर्फ एक आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक बड़ा जोखिम बनता जा रहा है। आने वाले समय में सरकार और RBI की नीतियां ही तय करेंगी कि यह चुनौती संकट बनती है या अवसर में बदली जा सकती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *