वैश्विक ऊर्जा बाजार में उस वक्त भारी उथल-पुथल मच गई जब United States और Iran के बीच चल रही शांति वार्ता अचानक विफल हो गई। इस घटनाक्रम के तुरंत बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला, जिसने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चिंता बढ़ा दी है और महंगाई के नए खतरे को जन्म दे दिया है।
अमेरिका के वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI Crude Oil की कीमत करीब 8 प्रतिशत उछलकर 104.24 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जबकि Brent Crude भी 7 प्रतिशत की बढ़त के साथ 102.29 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। कुछ ही समय पहले ये कीमतें 95 डॉलर के आसपास आ गई थीं, लेकिन वार्ता टूटने के साथ ही बाजार में राहत खत्म हो गई और तेजी का दौर शुरू हो गया।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब US Central Command ने ईरानी बंदरगाहों के आसपास नौसैनिक नाकाबंदी की घोषणा कर दी। इस कदम का मकसद ईरान के तेल निर्यात को सीमित करना बताया जा रहा है, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन पर सीधा असर पड़ सकता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक, Strait of Hormuz दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है, जहां से करीब 20 प्रतिशत वैश्विक तेल व्यापार गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में बढ़ता तनाव किसी भी समय सप्लाई बाधित कर सकता है, जिससे कीमतों में और उछाल आ सकता है।
इस तनाव का असर सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं रहा। वैश्विक वित्तीय बाजार भी इसकी चपेट में आ गए हैं। डॉलर मजबूत हुआ है, जबकि शेयर बाजारों में गिरावट दर्ज की गई है। जोखिम वाली मुद्राएं जैसे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और ब्रिटिश पाउंड दबाव में हैं। वहीं सोने की कीमतों में भी मुनाफावसूली के चलते गिरावट देखी गई, जो निवेशकों की रणनीति में बदलाव का संकेत देती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका-ईरान के बीच तनाव जल्द कम नहीं हुआ, तो तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है। इसका सीधा असर वैश्विक महंगाई, ट्रांसपोर्ट लागत और आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा।
कुल मिलाकर, ऊर्जा बाजार इस समय बेहद संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है, जहां हर भू-राजनीतिक घटनाक्रम कीमतों को तेजी से प्रभावित कर रहा है और आने वाले दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है।