छत्तीसगढ़ समेत देशभर में इस बार आलू की बंपर पैदावार ने बाजार का पूरा समीकरण बदल दिया है। उत्पादन करीब डेढ़ गुना बढ़ने और निर्यात ठप पड़ने की वजह से आलू के दाम वर्षों के निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। हालात ऐसे हैं कि थोक बाजार में आलू की कीमत महज 6.5 से 7 रुपए किलो तक सिमट गई है, जो पिछले करीब दो दशकों में सबसे कम मानी जा रही है।
रायपुर समेत प्रदेश के बड़े बाजारों में आलू की आवक लगातार बनी हुई है। खासतौर पर West Bengal और Uttar Pradesh से भारी मात्रा में आलू पहुंच रहा है। बंगाल से आने वाला आलू 4 से 4.5 रुपए प्रति किलो के भाव में मिल रहा है, लेकिन इसमें करीब 2.5 रुपए प्रति किलो तक का भाड़ा जुड़ने के बाद थोक बाजार में इसकी कीमत 7 रुपए के आसपास पड़ रही है। मांग कमजोर होने के कारण व्यापारियों को मजबूरी में कम दाम पर ही माल बेचना पड़ रहा है।
आलू की इस गिरावट के पीछे एक और बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय हालात भी हैं। United States, Israel और Iran के बीच बढ़ते तनाव का असर खाड़ी देशों के व्यापार पर पड़ा है, जिससे इस बार आलू का निर्यात लगभग ठप हो गया है। नतीजतन देश के भीतर ही भारी मात्रा में स्टॉक जमा हो गया है और कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है।
प्रदेश के भीतर भी अलग-अलग क्षेत्रों में आलू की आपूर्ति और पसंद का पैटर्न अलग है। रायपुर, दुर्ग और बस्तर संभाग में बंगाल का आलू ज्यादा पसंद किया जाता है, जबकि बिलासपुर और सरगुजा संभाग में उत्तर प्रदेश का आलू अधिक चलता है। इन दोनों राज्यों में इस बार रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है, जिसने बाजार में आपूर्ति को और बढ़ा दिया है।
हालांकि थोक बाजार में कीमतें गिरने के बावजूद खुदरा बाजार की तस्वीर अलग है। यहां उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिल रही है। रायपुर की मंडियों में आलू 15 रुपए किलो से लेकर 20 रुपए किलो तक बेचा जा रहा है। यानी थोक और खुदरा कीमतों के बीच बड़ा अंतर साफ नजर आ रहा है, जिससे आम ग्राहकों को सस्ता आलू नहीं मिल पा रहा, जबकि किसान और व्यापारी दोनों घाटे में हैं।
भनपुरी आलू-प्याज मंडी के कारोबारियों के मुताबिक, पिछले 20 सालों में पहली बार ऐसा हुआ है जब अच्छी क्वालिटी का आलू थोक में 7 रुपए किलो तक गिर गया हो। आमतौर पर यही आलू 10 से 12 रुपए किलो के बीच बिकता था। इस बार कीमतों में आई इस भारी गिरावट ने किसानों की कमाई पर सीधा असर डाला है, वहीं व्यापारियों का मार्जिन भी लगभग खत्म हो गया है।
कुल मिलाकर, बंपर उत्पादन, कमजोर मांग और निर्यात ठप होने की वजह से आलू बाजार में भारी असंतुलन देखने को मिल रहा है। अगर जल्द ही स्थिति नहीं सुधरी, तो इसका असर आने वाले सीजन में किसानों की खेती के फैसलों पर भी पड़ सकता है।