पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, खासकर ईरान से जुड़े हालातों का असर अब सीधे आम भारतीयों की जेब पर पड़ने लगा है। रसोई से लेकर रोजमर्रा के सामान और घरेलू उपकरणों तक, हर चीज या तो महंगी हो चुकी है या जल्द महंगी होने वाली है। कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने बाजार में ऐसा दबाव बनाया है, जिसका असर हर सेक्टर में दिखाई दे रहा है।
खाने के तेल की कीमतों में 7% से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जो आम परिवारों के बजट पर सीधा असर डाल रही है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ते ही घरेलू बाजार में इसका असर तुरंत दिखने लगता है। पाम ऑयल, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल जैसे जरूरी उत्पाद अब पहले से ज्यादा महंगे हो चुके हैं।
इस बीच FMCG सेक्टर में कंपनियों ने एक नया तरीका अपनाना शुरू कर दिया है, जिसे ‘श्रिंकफ्लेशन’ कहा जाता है। बढ़ती लागत के कारण कंपनियां साबुन, शैंपू, बिस्किट जैसे प्रोडक्ट्स के पैकेट छोटे कर रही हैं, ताकि कीमत सीधे न बढ़ानी पड़े। हालांकि, इससे ग्राहकों को कम मात्रा में सामान मिल रहा है, यानी खर्च वही लेकिन फायदा कम।
कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के कारण पेट्रोकेमिकल से बनने वाले उत्पादों की सप्लाई भी प्रभावित हुई है। इससे शैंपू और साबुन जैसे उत्पादों के निर्माण में दिक्कत आ रही है। कंपनियां लागत बढ़ने के दबाव में या तो दाम बढ़ा रही हैं या पैकेजिंग में कटौती कर रही हैं।
घरेलू उपकरणों की बात करें तो वॉशिंग मशीन, फ्रिज, पंखे और एलईडी जैसे प्रोडक्ट्स की कीमतों में 10 से 15% तक बढ़ोतरी देखी जा रही है। मैन्युफैक्चरिंग लागत बढ़ने के कारण कंपनियां इसका बोझ ग्राहकों पर डाल रही हैं। गर्मी के मौसम को देखते हुए एसी की मांग बढ़ने की उम्मीद है, जिससे इस सेक्टर में कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।
टेक्सटाइल और पेंट सेक्टर भी इससे अछूते नहीं हैं। सिंथेटिक फाइबर जैसे पॉलिएस्टर और नायलॉन की कीमतों में 20-25% तक उछाल आया है। इसके चलते आने वाले समय में कपड़े और पेंट के दाम भी 2 से 5% तक बढ़ सकते हैं। प्लास्टिक की लागत में करीब 50% तक बढ़ोतरी ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है।
कुल मिलाकर, अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर अब हर घर के खर्च पर दिखने लगा है। महंगाई की यह लहर आने वाले समय में और तेज हो सकती है, जिससे आम लोगों को अपने बजट में बदलाव करना पड़ सकता है।