छत्तीसगढ़ में शराब की नई पैकेजिंग नीति अब बड़ा विवाद बनती जा रही है। कांच की बोतलों की जगह प्लास्टिक (PET) बोतलों में शराब बेचने के सरकार के फैसले के खिलाफ डिस्टिलर्स और बोतल एसोसिएशन खुलकर विरोध में उतर आए हैं। इसका सीधा असर अब बाजार में दिखने लगा है, जहां सरकारी शराब दुकानों में सस्ती शराब की किल्लत पैदा हो गई है और कई जगहों पर यह पूरी तरह गायब तक हो चुकी है।
सरकार का तर्क है कि प्लास्टिक बोतलों के इस्तेमाल से लॉजिस्टिक्स आसान होंगे, टूट-फूट की समस्या खत्म होगी और ट्रांसपोर्टेशन लागत भी कम आएगी। लेकिन उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि यह फैसला बिना पर्याप्त तैयारी के लिया गया है, जिससे उनके कारोबार पर गंभीर असर पड़ सकता है।
विरोध के चलते कई डिस्टिलर्स ने उत्पादन और सप्लाई धीमी कर दी है। नतीजा यह हुआ कि दुकानों में खासकर लो-कॉस्ट शराब—जैसे देसी और सस्ती विदेशी ब्रांड्स—की भारी कमी देखने को मिल रही है। ग्राहक दुकानों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें मनचाहा स्टॉक नहीं मिल पा रहा है।
इस विवाद के बीच एक और दिलचस्प और चिंताजनक पहलू सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक, फील्ड स्तर के कुछ अधिकारियों ने कथित तौर पर अपना एक अलग समूह बना लिया है और वे अपनी तरह से कार्रवाई कर रहे हैं। कई जिलों में शराब दुकानों के बाहर ग्राहकों पर चालान की कार्रवाई भी शुरू कर दी गई है, जिससे आम लोगों की परेशानी और बढ़ गई है। हालांकि, इस संघ की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विभाग के भीतर मतभेद साफ तौर पर नजर आ रहे हैं।
दूसरी ओर, इस नीति के खिलाफ आवाज पहले से ही उठ रही थी। फरवरी 2026 में बॉटलिंग एसोसिएशन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार से इस फैसले को वापस लेने की मांग की थी। उनका कहना है कि इस बदलाव से करीब 15 लाख परिवारों की आजीविका प्रभावित हो सकती है, खासकर वे लोग जो कांच की बोतलों के रीसाइक्लिंग और संबंधित कामों से जुड़े हैं।
कुल मिलाकर, प्लास्टिक बोतल नीति को लेकर जारी इस खींचतान का सबसे ज्यादा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। एक तरफ सरकार अपने फैसले को लागू करने पर अड़ी है, तो दूसरी तरफ उद्योग जगत इसका विरोध कर रहा है—और इसी बीच बाजार में सस्ती शराब की कमी ने हालात और ज्यादा बिगाड़ दिए हैं।