छत्तीसगढ़ के चर्चित CGMSC घोटाले में एंटी करप्शन ब्यूरो ने एक और बड़ा कदम उठाते हुए पूरक चालान पेश कर दिया है। इस कार्रवाई में कुंजल शर्मा समेत चार आरोपियों को घेरा गया है, जिन पर मेडिकल सामग्री की कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ाकर सरकार को भारी नुकसान पहुंचाने का आरोप है।
जांच में सामने आया है कि ‘हमर लैब’ योजना के तहत सरकारी अस्पतालों के लिए खरीदे जाने वाले मेडिकल उपकरण और रिएजेंट्स की खरीद प्रक्रिया में बड़े स्तर पर गड़बड़ी की गई। तीन प्रमुख कंपनियों ने मिलकर टेंडर प्रक्रिया को प्रभावित किया और प्रतिस्पर्धा खत्म करने के लिए फर्जी दस्तावेजों और एक जैसी दरों का इस्तेमाल किया।
ACB की रिपोर्ट के अनुसार, रिकॉर्डर्स एंड मेडिकेयर सिस्टम्स, श्री शारदा इंडस्ट्रीज और मोक्षित कॉर्पोरेशन ने सिंडिकेट बनाकर टेंडर में समान पैटर्न पर उत्पाद, पैक साइज और कीमतें भरीं। इससे यह सुनिश्चित किया गया कि टेंडर उन्हीं कंपनियों को मिले और अन्य प्रतिस्पर्धी बाहर हो जाएं।
सबसे गंभीर आरोप कुंजल शर्मा पर लगे हैं, जिन पर यह आरोप है कि उन्होंने रिएजेंट्स और कंज्यूमेबल्स की कीमतें वास्तविक MRP से कई गुना अधिक दिखाकर प्रस्तुत कीं। इसका सीधा असर यह हुआ कि टेंडर में ऊंची दरें स्वीकृत हो गईं और शासन को करीब 550 करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा।
अब तक इस मामले में कुल 10 आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किया जा चुका है, जबकि जांच एजेंसियां अभी भी इस पूरे नेटवर्क की तह तक पहुंचने में जुटी हैं। माना जा रहा है कि आने वाले समय में और भी बड़े नाम सामने आ सकते हैं।
इस घोटाले की शुरुआत दिसंबर 2024 में हुई शिकायत से हुई थी, जब ननकीराम कंवर ने प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय एजेंसियों को मामले की जानकारी दी थी। इसके बाद आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) ने जांच शुरू की और FIR दर्ज की गई।
जांच में यह भी खुलासा हुआ कि कुछ फर्मों को बेहद कम समय—सिर्फ 27 दिनों के भीतर—करीब 750 करोड़ रुपए के ऑर्डर दे दिए गए, जबकि उस समय इतनी बड़ी मात्रा में उपकरणों की तत्काल जरूरत भी नहीं थी। इससे यह साफ होता है कि पूरा मामला सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया।
इसके अलावा, इस केस में शशांक चोपड़ा को मास्टरमाइंड माना जा रहा है, जिनसे पूछताछ के बाद कई अधिकारियों और नेटवर्क की भूमिका सामने आई थी। अब एजेंसियां साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की तैयारी में हैं।
कुल मिलाकर, CGMSC घोटाला प्रदेश के सबसे बड़े स्वास्थ्य घोटालों में गिना जा रहा है, जिसने सरकारी खरीद प्रक्रिया और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।