देश के महान स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस को ‘राष्ट्रपुत्र’ घोषित करने की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए इसे सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने न सिर्फ याचिका को निराधार बताया, बल्कि याचिकाकर्ता की मंशा पर भी सवाल उठाए और साफ शब्दों में कहा कि इस तरह की याचिकाएं सिर्फ प्रचार पाने के लिए दाखिल की जा रही हैं।
सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने याचिकाकर्ता पिनाकपानी मोहंती को जमकर फटकार लगाई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह कोई पहला मौका नहीं है जब ऐसी याचिका सामने आई हो, बल्कि इससे पहले भी इसी तरह के मामलों में अदालत का समय बर्बाद किया गया है। बेंच ने तीखी टिप्पणी करते हुए यहां तक कह दिया कि “आप सुधरने वाले नहीं हैं” और अगर यही रवैया जारी रहा तो भविष्य में सुप्रीम कोर्ट में एंट्री तक बैन की जा सकती है।
दरअसल, इस याचिका में तीन बड़ी मांगें रखी गई थीं—पहली, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ‘राष्ट्रीय पुत्र’ का दर्जा दिया जाए; दूसरी, आजाद हिंद फौज के स्थापना दिवस 21 अक्टूबर 1943 को राष्ट्रीय दिवस घोषित किया जाए; और तीसरी, नेताजी की जयंती 23 जनवरी को राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाए। लेकिन कोर्ट ने इन सभी मांगों को एक झटके में खारिज कर दिया और इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया।
इतना ही नहीं, अदालत ने रजिस्ट्री को भी सख्त निर्देश दिए कि भविष्य में इस याचिकाकर्ता द्वारा दाखिल की जाने वाली किसी भी PIL को स्वीकार न किया जाए। यह निर्देश इस बात का संकेत है कि सुप्रीम कोर्ट अब इस तरह की ‘पब्लिसिटी स्टंट’ वाली याचिकाओं को लेकर बिल्कुल भी नरमी के मूड में नहीं है।
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब पिनाकपानी मोहंती इस तरह की याचिका लेकर अदालत पहुंचे हों। इससे पहले 2024 में भी उन्होंने नेताजी की मौत की जांच की मांग को लेकर याचिका दायर की थी, जिसे उस समय भी कोर्ट ने खारिज करते हुए उनकी मंशा और समय पर सवाल उठाए थे। उस वक्त भी अदालत ने साफ कर दिया था कि चुनावी माहौल में इस तरह की याचिकाएं संदेह पैदा करती हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि देश की सर्वोच्च अदालत अब उन याचिकाओं पर सख्त कार्रवाई करने के मूड में है, जिनका मकसद न्याय नहीं बल्कि सुर्खियां बटोरना होता है। नेताजी जैसे महान व्यक्तित्व का नाम लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाना अब आसान नहीं होगा, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दे दिया है—न्यायालय का समय अनमोल है और उसका दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।