छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में हुए बहुचर्चित ट्रिपल मर्डर केस ने आखिरकार छह साल बाद अपने अंजाम तक पहुंचते हुए एक बड़ा न्यायिक फैसला देखा। इस सनसनीखेज मामले में कोर्ट ने आरोपी रवि शर्मा को फांसी की सजा सुनाई है। यह वही मामला है, जिसने अपनी क्रूरता और साजिश के चलते पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था। आरोपी ने न सिर्फ अपनी पत्नी और डेढ़ महीने की मासूम बच्ची की बेरहमी से हत्या की, बल्कि खुद को बचाने के लिए एक निर्दोष मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को भी मौत के घाट उतार दिया।
यह घटना साल 2020 की है, जब भिलाई के तालपुरी स्थित पारिजात कॉलोनी में एक घर के अंदर से उठता धुआं और बंद दरवाजा लोगों के लिए रहस्य बन गया था। जब परिजन दरवाजा तोड़कर अंदर पहुंचे, तो सामने का मंजर किसी खौफनाक फिल्म से कम नहीं था। कमरे में मंजू शर्मा की अधजली लाश पड़ी थी, उसके हाथ-पैर और मुंह टेप से बंधे हुए थे। पास ही उसकी डेढ़ महीने की मासूम बच्ची मृत अवस्था में मिली। वहीं बिस्तर के नीचे एक और युवक का शव था, जिसे देखकर पहले यह समझा गया कि वह आरोपी खुद है, लेकिन बाद में यह भ्रम टूट गया।
जांच की परतें जैसे-जैसे खुलती गईं, सच्चाई उतनी ही भयावह होती चली गई। सामने आया कि आरोपी पहले से शादीशुदा था और उसकी पहली पत्नी और बच्चे ओडिशा के राउरकेला में रहते थे। भिलाई में उसने मंजू से दूसरी शादी कर ली थी, लेकिन वह नवजात बच्ची को स्वीकार नहीं करना चाहता था। इसी वजह से दोनों के बीच अक्सर विवाद होता था, जो आखिरकार इस जघन्य अपराध में बदल गया।
आरोपी ने पूरी योजना के तहत एक मानसिक रूप से कमजोर युवक को शराब का लालच देकर घर बुलाया और उसे नशीला पदार्थ पिलाकर बेहोश कर दिया। इसके बाद हथौड़े से उसकी हत्या कर दी, ताकि उसके शव को खुद का शव दिखाकर पुलिस को गुमराह किया जा सके। फिर उसने अपनी पत्नी को भी नशीली दवा देकर सुलाया और गला घोंटकर मार डाला। इसके बाद अपनी ही मासूम बेटी की हत्या कर उसने इंसानियत की सारी हदें पार कर दीं।
सिर्फ हत्या ही नहीं, बल्कि आरोपी ने सबूत मिटाने के लिए पूरा घर जलाने की भी कोशिश की। उसने गैस सिलेंडर को इस तरह सेट किया कि आग लगने पर ब्लास्ट हो जाए और पूरा मामला हादसा लगे। लेकिन उसका यह प्लान पूरी तरह सफल नहीं हो सका और यही उसकी गिरफ्तारी की बड़ी वजह बना।
पुलिस ने इस मामले में तकनीकी और भौतिक दोनों तरह के सबूतों को मजबूत आधार बनाया। सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल कॉल डिटेल्स, घटनास्थल से बरामद हथियार, दवाइयों के रैपर और हस्तलेख विशेषज्ञ की रिपोर्ट—इन सभी ने आरोपी के खिलाफ केस को पुख्ता कर दिया। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि दीवार पर लिखे गए भ्रामक संदेश भी आरोपी ने ही लिखे थे, ताकि जांच को गलत दिशा में मोड़ा जा सके।
आखिरकार दुर्ग जिला न्यायालय के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश यशवंत कुमार सारथी ने इस मामले को “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” मानते हुए आरोपी को मौत की सजा सुनाई। अदालत ने माना कि यह अपराध इतना जघन्य और अमानवीय है कि इसके लिए कठोरतम सजा ही न्यायसंगत है।
इस पूरे मामले में शासकीय वकील भावेश कटरे ने मजबूत पैरवी की, जबकि जांच को अंजाम तक पहुंचाने में तत्कालीन थाना प्रभारी सुरेश कुमार ध्रुव की भूमिका भी अहम रही।
यह फैसला न केवल पीड़ित परिवार के लिए न्याय का एक प्रतीक है, बल्कि समाज को यह भी संदेश देता है कि ऐसे जघन्य अपराधों के लिए कानून की पकड़ से बच पाना संभव नहीं है।