छत्तीसगढ़ के इतिहास में ताड़मेटला नक्सली हमला देश के सबसे भयावह और दर्दनाक हमलों में गिना जाता है। साल 2010 में हुए इस हमले में 75 CRPF जवान और एक राज्य पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे। लेकिन 16 साल बीत जाने के बाद भी इस नरसंहार में किसी आरोपी का दोष साबित नहीं हो सका। अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में जांच एजेंसियों और अभियोजन की गंभीर खामियों पर सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि यह बेहद पीड़ादायक है कि इतने बड़े नरसंहार के बावजूद जांच एजेंसियां असली हमलावरों की पहचान तक साबित नहीं कर सकीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि इतने गंभीर मामले में अदालत के सामने ऐसा कोई कानूनी रूप से स्वीकार्य और भरोसेमंद साक्ष्य पेश नहीं किया गया, जिससे आरोपियों का दोष सिद्ध हो सके।
यह फैसला रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुनाया। अदालत ने राज्य सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी।
दरअसल, 6 अप्रैल 2010 को ताड़मेटला इलाके में CRPF की 62वीं बटालियन एरिया डॉमिनेशन ऑपरेशन पर निकली थी। इसी दौरान भारी संख्या में मौजूद माओवादियों ने जवानों को घेरकर हमला कर दिया। हमले में सैकड़ों IED और भारी हथियारों का इस्तेमाल किया गया। यह हमला इतना बड़ा था कि पूरा देश दहल गया था और इसे भारतीय सुरक्षा बलों पर सबसे घातक नक्सली हमलों में शामिल किया गया।
हमले के बाद जांच एजेंसियों ने कार्रवाई करते हुए 10 लोगों को गिरफ्तार किया। इन पर हत्या, आपराधिक साजिश, दंगा, डकैती और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम सहित कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया। अभियोजन पक्ष का दावा था कि ये सभी आरोपी नक्सली संगठन से जुड़े थे और हमले में इनकी भूमिका थी।
लेकिन जब मामला दंतेवाड़ा सेशन कोर्ट पहुंचा तो अभियोजन पक्ष अपने दावों को मजबूती से साबित नहीं कर पाया। अदालत ने पाया कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद नहीं थे और जांच में कई गंभीर प्रक्रियागत खामियां थीं। इसके बाद 7 जनवरी 2013 को सभी 10 आरोपियों को बरी कर दिया गया। इनमें से दो आरोपियों की बाद में मौत हो चुकी है।
राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। सरकार की ओर से महाधिवक्ता विवेक शर्मा और उप महाधिवक्ता सौरभ पांडे ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सही तरीके से नहीं देखा। हालांकि हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि ट्रायल कोर्ट का निर्णय न तो तर्कहीन था और न ही न्यायिक रूप से गलत कहा जा सकता है। इसलिए उसमें हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा कुख्यात नक्सली कमांडर मड़ावी हिड़मा के नाम की रही। सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से उसे ताड़मेटला नरसंहार का मास्टरमाइंड मानती रही हैं। बस्तर के कई बड़े नक्सली हमलों में उसका नाम सामने आता रहा। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक उसके खिलाफ छत्तीसगढ़ में दो दर्जन से ज्यादा गंभीर मामले दर्ज थे।
ताड़मेटला के अलावा चिंतागुफा, बुरकापाल, मिनपा, टेकलगुड़म और पिडमेल जैसे कई बड़े नक्सली हमलों में भी हिड़मा का नाम जुड़ता रहा। आखिरकार 18 नवंबर 2025 को आंध्र प्रदेश के मारेडूमिल्ली जंगलों में सुरक्षाबलों ने एक बड़े ऑपरेशन में हिड़मा को मार गिराया। इस मुठभेड़ में उसकी पत्नी राजे समेत कई अन्य नक्सली भी मारे गए थे। हालांकि माओवादी संगठन ने इसे फर्जी एनकाउंटर बताया था।
ताड़मेटला नरसंहार पर आए इस फैसले ने एक बार फिर देश की जांच व्यवस्था, अभियोजन प्रणाली और नक्सल हिंसा के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 76 जवानों की शहादत के 16 साल बाद भी दोष तय न हो पाना सुरक्षा बलों के परिवारों और पूरे देश के लिए एक गहरी पीड़ा बनकर सामने आया है।