छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित कोल लेवी वसूली घोटाले में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपी सूर्यकांत तिवारी के ड्राइवर और कथित करीबी सहयोगी नारायण साहू की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि उपलब्ध साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि नारायण साहू केवल वाहन चालक की भूमिका में नहीं था, बल्कि पूरे अवैध वसूली नेटवर्क का सक्रिय हिस्सा बनकर काम कर रहा था। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उसे राहत देने से इनकार कर दिया।
इस फैसले को कोल सिंडिकेट मामले की जांच कर रही एजेंसियों के लिए बड़ी सफलता माना जा रहा है। अदालत ने अपने आदेश में माना कि आरोपी के खिलाफ मौजूद दस्तावेज, डायरियां, गवाहों के बयान और जांच रिपोर्ट प्रथम दृष्टया गंभीर आर्थिक अपराध की ओर इशारा करते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि आरोपी को इस स्तर पर जमानत दी जाती है तो इससे जांच प्रभावित हो सकती है और सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका बढ़ सकती है।
दरअसल, इस पूरे मामले ने तब बड़ा मोड़ लिया था जब प्रवर्तन निदेशालय यानी ED ने कोल लेवी सिंडिकेट को लेकर अपनी जांच तेज की। 11 जनवरी 2024 को ED के डिप्टी डायरेक्टर संदीप आहूजा की ओर से एसीबी-ईओडब्ल्यू को औपचारिक शिकायत भेजी गई थी। यह शिकायत डिप्टी एसपी फरहान कुरैशी के माध्यम से दर्ज कराई गई थी। शिकायत में मनी लॉन्ड्रिंग प्रिवेंशन एक्ट 2002 की धारा 66(2) के तहत कई गंभीर जानकारियां साझा की गई थीं, जिनके आधार पर राज्य की जांच एजेंसियों ने कार्रवाई शुरू की।
इसके बाद 17 जनवरी 2024 को ईओडब्ल्यू और एसीबी रायपुर ने बड़ी कार्रवाई करते हुए कुल 35 आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज की। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सरकार के दौरान चर्चाओं में रहे कई नाम शामिल थे। सौम्या चौरसिया, आईएएस रानू साहू, समीर विश्नोई, सूर्यकांत तिवारी और नारायण साहू समेत कई लोगों पर अवैध वसूली, भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आरोप लगाए गए।
जांच एजेंसियों के अनुसार, कोयला कारोबार से जुड़ी अवैध वसूली का यह नेटवर्क लंबे समय तक संगठित तरीके से संचालित किया गया। जांच में दावा किया गया कि कोयला परिवहन और कारोबार से जुड़े लोगों से अवैध रूप से रकम वसूली जाती थी और इस पूरे सिस्टम का संचालन सिंडिकेट की तरह किया जा रहा था।
मामले में सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब 30 जून 2022 को आयकर विभाग ने सूर्यकांत तिवारी और उसके सहयोगियों के कई ठिकानों पर छापेमारी की। इस दौरान हाथ से लिखी कई डायरियां और दस्तावेज बरामद किए गए। जांच एजेंसियों ने कोर्ट को बताया कि इन डायरियों में “नारायण” नाम से कई संदिग्ध एंट्रियां दर्ज थीं। बाद में जांच में यह दावा किया गया कि ये एंट्रियां लगभग 13 करोड़ रुपये की अवैध नकद वसूली से जुड़ी हुई थीं।
जांच रिपोर्ट के मुताबिक, नारायण साहू इस कथित वसूली नेटवर्क में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहा था। एजेंसियों का दावा है कि वह केवल एक ड्राइवर नहीं था, बल्कि पैसे के लेन-देन, वसूली और नेटवर्क संचालन में सक्रिय भूमिका निभा रहा था। यही वजह रही कि कोर्ट ने उसे “सक्रिय सदस्य” मानते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी माना कि आर्थिक अपराधों का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है और ऐसे मामलों में जांच को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने देना जरूरी होता है। अदालत ने यह आशंका भी जताई कि आरोपी के बाहर आने पर गवाहों को प्रभावित करने या साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की संभावना बनी रह सकती है।
इस फैसले के बाद माना जा रहा है कि कोल लेवी घोटाले की जांच और तेज हो सकती है। जांच एजेंसियां पहले ही दावा कर चुकी हैं कि यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक अपराध का बड़ा नेटवर्क है, जिसमें कई प्रभावशाली लोगों की भूमिका सामने आई है।