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जिस इंसेफेलाइटिस से कांपता था पूर्वांचल, अब उसी बीमारी पर यूपी ने पाया लगभग पूरा नियंत्रण

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उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में कभी बच्चों के लिए काल बन चुकी इंसेफेलाइटिस बीमारी अब धीरे-धीरे इतिहास बनती नजर आ रही है। वर्षों तक गोरखपुर और आसपास के जिलों में हर साल सैकड़ों परिवार इस बीमारी की वजह से अपने बच्चों को खो देते थे, लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। स्वास्थ्य विभाग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, ‘गोरखपुर मॉडल’ की सफलता ने इस जानलेवा बीमारी पर बड़ी जीत दिलाई है और इस साल मौत का आंकड़ा शून्य तक पहुंच गया है।

Uttar Pradesh सरकार की इस रणनीति को स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। खास बात यह है कि अब इसी मॉडल को दूसरी संक्रामक बीमारियों पर भी लागू करने की तैयारी शुरू कर दी गई है, ताकि प्रदेश को मलेरिया, टीबी, डेंगू और कुष्ठ जैसी बीमारियों से भी राहत मिल सके।

दरअसल, पहले इंसेफेलाइटिस के मरीजों का इलाज लगभग पूरी तरह BRD Medical College पर निर्भर था। मरीजों की संख्या ज्यादा होने से अस्पतालों पर भारी दबाव रहता था और समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण मौतें भी बढ़ जाती थीं। लेकिन ‘गोरखपुर मॉडल’ के तहत सरकार ने इलाज की व्यवस्था को गांव और ब्लॉक स्तर तक पहुंचा दिया। हर ब्लॉक में इंसेफेलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर बनाए गए और पीएचसी-सीएचसी में बाल रोग विशेषज्ञों की तैनाती की गई। इसका असर यह हुआ कि अब ज्यादातर मरीज स्थानीय स्तर पर ही ठीक हो रहे हैं और रेफरल की जरूरत काफी कम हो गई है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो बदलाव साफ दिखाई देता है। 2017 से पहले एईएस और जापानी इंसेफेलाइटिस के मामलों में मृत्यु दर काफी अधिक थी। लेकिन लगातार निगरानी, टीकाकरण और जागरूकता अभियानों के बाद हालात तेजी से बदले। 2023 में जहां एईएस के करीब 300 मामले सामने आए थे और मृत्यु दर केवल 0.6 प्रतिशत रह गई थी, वहीं 2025 तक मरीजों की संख्या घटकर सिर्फ 10 रह गई। सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि 2026 में अब तक केवल तीन छिटपुट मामले सामने आए हैं और किसी भी मरीज की मौत नहीं हुई है।

इस सफलता के पीछे सरकार के ‘दस्तक अभियान’ और Swachh Bharat Mission की अहम भूमिका मानी जा रही है। स्वास्थ्य कर्मियों ने गांव-गांव जाकर लोगों को साफ-सफाई, स्वच्छ पेयजल और टीकाकरण के प्रति जागरूक किया। प्रभावित इलाकों में 100 प्रतिशत टीकाकरण सुनिश्चित किया गया और बुखार के मरीजों की तुरंत जांच के लिए विशेष टीमें बनाई गईं। बीमारी फैलने से पहले ही मरीजों की पहचान कर इलाज शुरू कर दिया जाता है, जिससे संक्रमण पर तेजी से नियंत्रण पाया जा रहा है।

अब इस मॉडल की सफलता से उत्साहित सरकार ने इसे दूसरी बीमारियों के खिलाफ भी लागू करने का फैसला किया है। प्रदेश में मलेरिया, फाइलेरिया, डेंगू, टीबी और कुष्ठ रोग को खत्म करने के लिए ब्लॉक स्तर पर निगरानी तंत्र मजबूत किया जा रहा है। माइक्रो-प्लानिंग और लोकल हेल्थ नेटवर्क के जरिए सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश को संक्रामक रोगों से काफी हद तक मुक्त करना है।

जिस पूर्वांचल में कभी इंसेफेलाइटिस का नाम सुनते ही डर का माहौल बन जाता था, आज वही क्षेत्र स्वास्थ्य प्रबंधन के सफल मॉडल के तौर पर पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है।

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