देश में महंगाई ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। अप्रैल 2026 में थोक महंगाई दर यानी WPI बढ़कर 8.30% पर पहुंच गई है, जो पिछले 42 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। इससे पहले अक्टूबर 2022 में थोक महंगाई 8.39% दर्ज की गई थी। मार्च 2026 में यह आंकड़ा 3.88% था, यानी सिर्फ एक महीने में महंगाई में 4.42% की तेज बढ़ोतरी हुई है।
Ministry of Commerce and Industry ने 14 मई को थोक महंगाई के ताजा आंकड़े जारी किए। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते तनाव, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच हालात बिगड़ने की वजह से कच्चे तेल और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों में तेजी आई है, जिसका असर भारत पर भी पड़ रहा है।
सबसे ज्यादा असर रोजमर्रा की जरूरत की चीजों और ईंधन की कीमतों में देखने को मिला है। प्राइमरी आर्टिकल्स यानी दैनिक जरूरत के सामानों की महंगाई 6.36% से बढ़कर 9.17% हो गई। वहीं फूड इंडेक्स 1.85% से बढ़कर 1.98% तक पहुंच गया है।
सबसे बड़ा झटका फ्यूल और पावर सेक्टर में देखने को मिला, जहां थोक महंगाई दर 1.05% से बढ़कर सीधे 24.71% तक पहुंच गई। इसका असर आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल, बिजली और ट्रांसपोर्ट लागत पर भी पड़ सकता है।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर भी महंगाई से अछूता नहीं रहा। मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की थोक महंगाई दर 3.39% से बढ़कर 4.62% हो गई है। इसका मतलब है कि फैक्ट्री में बनने वाले सामानों की लागत बढ़ रही है, जिसका असर आगे चलकर आम ग्राहकों की जेब पर पड़ सकता है।
इधर रिटेल महंगाई यानी CPI भी अप्रैल में बढ़कर 3.48% पर पहुंच गई है। मार्च में यह 3.40% थी। खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ने से फूड इन्फ्लेशन 4.20% तक पहुंच गई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर थोक महंगाई लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो कंपनियां और निर्माता इसका बोझ सीधे ग्राहकों पर डालना शुरू कर देते हैं। ऐसे में आने वाले महीनों में रोजमर्रा के सामान, परिवहन, निर्माण सामग्री और अन्य उत्पादों की कीमतें और बढ़ सकती हैं।
भारत में महंगाई मापने के दो प्रमुख तरीके हैं। रिटेल महंगाई को Consumer Price Index यानी CPI कहा जाता है, जो आम ग्राहकों द्वारा चुकाई गई कीमतों पर आधारित होती है। वहीं थोक महंगाई को Wholesale Price Index यानी WPI कहा जाता है, जो थोक बाजार में कारोबारियों के बीच कीमतों को दर्शाती है।
सरकार आमतौर पर टैक्स में कटौती या अन्य आर्थिक कदमों के जरिए महंगाई को नियंत्रित करने की कोशिश करती है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं, तो आने वाले समय में महंगाई और बढ़ सकती है।