भारतीय रुपया लगातार दबाव में दिखाई दे रहा है और अब उसने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले नया रिकॉर्ड निचला स्तर छू लिया है। सोमवार को विदेशी मुद्रा बाजार खुलते ही रुपया 21 पैसे की बड़ी गिरावट के साथ 96.17 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। यह पहली बार है जब भारतीय मुद्रा इतनी कमजोर हुई है। इससे पहले पिछले कारोबारी सत्र में रुपया 95.96 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था, लेकिन नए सप्ताह की शुरुआत ने बाजार की चिंता और बढ़ा दी।
रुपये में आई इस तेज गिरावट के पीछे कई बड़े अंतरराष्ट्रीय कारण बताए जा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव, पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे हालात, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और अमेरिकी डॉलर की मजबूती ने भारतीय मुद्रा पर जबरदस्त दबाव बना दिया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात जल्दी नहीं सुधरे तो आने वाले दिनों में रुपया और कमजोर हो सकता है।
दरअसल, शुक्रवार को ही भारतीय रुपया पहली बार 96 प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया था। उस समय भी निवेशकों और बाजार विश्लेषकों ने चिंता जताई थी, लेकिन अब रुपया नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच चुका है। इसका सीधा असर आम लोगों से लेकर उद्योगों तक पर पड़ सकता है, क्योंकि कमजोर रुपया आयात को महंगा बनाता है और महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा करता है।
रुपये की गिरावट की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी मानी जा रही है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है, जिसने भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने का सीधा असर रुपये और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ता है।
बताया जा रहा है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने तेल बाजार को हिला दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक संयुक्त अरब अमीरात में एक परमाणु संयंत्र पर हमले के बाद वैश्विक बाजारों में डर का माहौल बन गया। इसके साथ ही अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की कोशिशों पर भी संकट गहराने लगा है। इन घटनाओं ने निवेशकों को और ज्यादा सतर्क बना दिया है।
इसी दौरान अमेरिका और चीन के बीच हुई अहम बैठक से भी बाजार को कोई राहत नहीं मिली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात से सकारात्मक नतीजों की उम्मीद थी, लेकिन कोई बड़ा समझौता सामने नहीं आया। इसका असर वैश्विक निवेशकों की सोच पर पड़ा और जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकलने लगा।
अमेरिका से आए मजबूत आर्थिक आंकड़ों ने डॉलर को और ताकत दे दी है। डॉलर इंडेक्स में मजबूती देखने को मिल रही है, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ गया है। जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत नजर आती है, तब निवेशक सुरक्षित विकल्प के तौर पर डॉलर की तरफ रुख करते हैं। इसका असर भारत जैसे देशों की मुद्रा पर सीधा पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बढ़ती अनिश्चितता भी एक बड़ा कारण है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापार मार्गों में शामिल है। यदि वहां हालात और बिगड़ते हैं, तो तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं।
बाजार विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अगर युद्ध लंबे समय तक जारी रहा और तेल व्यापार सामान्य नहीं हुआ, तो डॉलर-रुपया विनिमय दर और ऊपर जा सकती है। कुछ विशेषज्ञों ने तो यहां तक कहा है कि यदि भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने के लिए बड़े कदम नहीं उठाए, तो रुपया आने वाले समय में 100 प्रति डॉलर के स्तर तक भी पहुंच सकता है।
कमजोर रुपये का असर सिर्फ शेयर बाजार या विदेशी व्यापार तक सीमित नहीं रहता। इसका असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ता है। पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं, आयातित सामान की कीमत बढ़ सकती है और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में अब बाजार की नजर आरबीआई और सरकार के अगले कदमों पर टिकी हुई है।
फिलहाल विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता बनी हुई है और निवेशकों के बीच चिंता का माहौल साफ दिखाई दे रहा है। आने वाले दिनों में वैश्विक हालात और कच्चे तेल की कीमतें ही तय करेंगी कि रुपया संभलेगा या और नीचे जाएगा।