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कॉकरोच जनता पार्टी: सोशल मीडिया की सनसनी या भविष्य की नई राजनीति?

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डिजिटल दौर में राजनीति अब सिर्फ सभाओं, पोस्टरों और टीवी डिबेट तक सीमित नहीं रह गई है। सोशल मीडिया ने ऐसी नई राजनीतिक संस्कृतियों को जन्म दिया है, जो कभी मजाक लगती हैं लेकिन देखते ही देखते करोड़ों लोगों की चर्चा का विषय बन जाती हैं। इन दिनों इंस्टाग्राम और रील्स की दुनिया में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रही है ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ यानी CJP। व्यंग्य, मीम्स और तीखे राजनीतिक कटाक्ष के जरिए यह वर्चुअल पार्टी इंटरनेट पर ऐसी छा गई कि अब लोग मजाक-मजाक में यह सवाल पूछने लगे हैं कि क्या यह पार्टी कभी असली चुनाव भी लड़ सकती है?

महज कुछ दिनों में इस डिजिटल संगठन ने युवाओं के बीच जबरदस्त लोकप्रियता हासिल कर ली। इसकी रील्स और कंटेंट का अंदाज बिल्कुल अलग है। पारंपरिक राजनीतिक भाषणों की जगह यहां सरकार, व्यवस्था और नेताओं पर कटाक्ष करते हुए ऐसे वीडियो बनाए जा रहे हैं, जिन्हें लाखों लोग शेयर कर रहे हैं। यही वजह है कि सोशल मीडिया एंगेजमेंट के मामले में यह पेज बड़े-बड़े राजनीतिक दलों को चुनौती देता दिखाई देने लगा। दावा किया जा रहा है कि इंस्टाग्राम पर इसकी पहुंच कई स्थापित राजनीतिक संगठनों से भी ज्यादा तेज़ी से बढ़ी।

इस पूरी डिजिटल मुहिम के पीछे अभिजीत दिपके नाम का भारतीय शख्स बताया जा रहा है, जो फिलहाल अमेरिका के बोस्टन शहर से इस प्लेटफॉर्म को संचालित कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर इसकी लोकप्रियता इतनी तेजी से बढ़ी कि राजनीतिक हलकों में भी इसकी चर्चा शुरू हो गई। यहां तक कि कुछ नेताओं और सांसदों ने भी इस कंटेंट में दिलचस्पी दिखाई। हालांकि इस बीच बड़ा झटका तब लगा जब इसका मुख्य एक्स अकाउंट भारत में सस्पेंड कर दिया गया। इसके बाद समर्थकों ने इसे “डिजिटल सेंसरशिप” बताया, जबकि विरोधियों ने इसे केवल इंटरनेट ट्रेंड करार दिया।

लेकिन असली सवाल तब खड़ा हुआ जब चर्चा चुनावी मैदान तक पहुंच गई। क्या कॉकरोच जनता पार्टी वास्तव में चुनाव लड़ सकती है? और अगर हां, तो क्या इसे ‘कॉकरोच’ जैसा चुनाव चिन्ह मिल पाएगा? यहीं से चुनाव आयोग के नियमों की चर्चा शुरू हो गई।

भारत में चुनाव चिन्हों को लेकर बेहद सख्त नियम लागू हैं। चुनाव आयोग ने 1988 और 1991 के चुनाव चिन्ह आदेशों के तहत कई प्रतिबंध तय किए थे। खासतौर पर पशु-पक्षियों और जीव-जंतुओं से जुड़े नए चुनाव चिन्हों पर रोक लगा दी गई थी। इसके पीछे तर्क यह था कि राजनीतिक रैलियों और प्रचार के दौरान जानवरों के दुरुपयोग और क्रूरता की शिकायतें लगातार सामने आ रही थीं। बाद में आयोग ने 2012 में भी स्पष्ट निर्देश जारी किए कि नए पशु-आधारित प्रतीकों को मंजूरी नहीं दी जाएगी।

यही वजह है कि बहुजन समाज पार्टी का हाथी या फॉरवर्ड ब्लॉक का शेर जैसे पुराने प्रतीक तो बने रहे, लेकिन नए दलों को ऐसे चिन्ह नहीं दिए जाते। चूंकि कॉकरोच भी एक जीव की श्रेणी में आता है, इसलिए चुनाव आयोग के मौजूदा नियमों के तहत इस प्रतीक को मंजूरी मिलना लगभग असंभव माना जा रहा है।

सोशल मीडिया पर पार्टी के समर्थकों ने यह भी कहा कि अगर कॉकरोच सिंबल नहीं मिला तो वे “मोबाइल फोन” चुनाव चिन्ह की मांग कर सकते हैं। लेकिन यहां भी तकनीकी दिक्कत सामने आ गई। चुनाव आयोग की फ्री सिंबल लिस्ट में मोबाइल फोन नाम का कोई चिन्ह मौजूद ही नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि उसी सूची में लैंडलाइन फोन, मोबाइल चार्जर और लैपटॉप जैसे प्रतीक जरूर शामिल हैं, लेकिन आधुनिक मोबाइल फोन गायब है। इससे लोगों ने चुनाव आयोग की सूची को लेकर भी सोशल मीडिया पर खूब मजेदार टिप्पणियां कीं।

विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया पर वायरल होना और चुनावी राजनीति में उतरना दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। किसी भी संगठन को राजनीतिक दल के रूप में मान्यता पाने के लिए पहले लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29A के तहत चुनाव आयोग में आधिकारिक पंजीकरण कराना पड़ता है। यह प्रक्रिया लंबी, कानूनी और कई शर्तों से भरी होती है। पार्टी को संविधान, पदाधिकारियों की जानकारी, सदस्यता ढांचा और राजनीतिक गतिविधियों का पूरा विवरण देना पड़ता है।

इसके बाद ही चुनाव आयोग किसी “मुक्त प्रतीक” यानी फ्री सिंबल के लिए आवेदन स्वीकार करता है। इन फ्री सिंबल्स में ताला-चाबी, एयर कंडीशनर, नेल कटर, शतरंज बोर्ड और कई अजीब लेकिन वैध प्रतीक शामिल हैं। यानी अगर CJP कभी वास्तविक राजनीति में उतरती भी है, तो उसे कॉकरोच की जगह कोई दूसरा प्रतीक चुनना पड़ सकता है।

फिलहाल यह पूरी कहानी भारतीय राजनीति के बदलते डिजिटल स्वरूप की झलक देती है। पहले राजनीतिक दल जमीन पर बनते थे और फिर सोशल मीडिया तक पहुंचते थे, लेकिन अब सोशल मीडिया पर पैदा हुई “वर्चुअल पार्टियां” भी लोगों की राजनीतिक सोच को प्रभावित करने लगी हैं। खासकर युवा वर्ग मीम्स और व्यंग्य के जरिए राजनीति को नए अंदाज में देख रहा है।

कॉकरोच जनता पार्टी अभी भले ही एक व्यंग्यात्मक डिजिटल आंदोलन लग रही हो, लेकिन इसने यह जरूर साबित कर दिया है कि इंटरनेट के दौर में लोकप्रियता हासिल करने के नियम पूरी तरह बदल चुके हैं। आने वाले समय में यह केवल एक मजाक बनकर रह जाएगी या फिर किसी नए राजनीतिक प्रयोग का रूप लेगी, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।

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