छत्तीसगढ़ की राजनीति में संत, कथावाचक और धार्मिक मंच एक बार फिर बड़े राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गए हैं। इस बार मामला Jagadguru Rambhadracharya और नेता प्रतिपक्ष Charandas Mahant के बयान से जुड़ा है। चिरमिरी में आयोजित रामकथा के मंच से रामभद्राचार्य ने साफ कहा कि कोई उनके जगद्गुरुत्व को चुनौती देगा तो वह इसे स्वीकार नहीं करेंगे। उनका यह बयान उस समय आया जब चरणदास महंत ने उन्हें “भाजपा का प्रचारक” बताते हुए कहा था कि वह उन्हें जगद्गुरु नहीं मानते।
इस बयान के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति में धर्म और राजनीति को लेकर नई बहस छिड़ गई है। भाजपा ने इसे सीधे तौर पर सनातन और संत समाज का अपमान बताया, जबकि कांग्रेस नेताओं ने कहा कि यह टिप्पणी राजनीतिक संदर्भ में की गई थी।
दरअसल, छत्तीसगढ़ में यह पहला मौका नहीं है जब कांग्रेस नेताओं और संतों के बीच टकराव सामने आया हो। बीते कुछ वर्षों में कांग्रेस नेताओं के बयान और संतों के मंचों पर उनकी मौजूदगी दोनों ही लगातार चर्चा का विषय रहे हैं। यही वजह है कि अब विपक्ष कांग्रेस पर “दोहरी राजनीति” करने का आरोप लगा रहा है।
कुछ साल पहले तक कांग्रेस के कई बड़े नेता संतों और कथावाचकों के मंचों पर सम्मान के साथ दिखाई देते थे। पूर्व मुख्यमंत्री Bhupesh Baghel रायपुर में आयोजित Pradeep Mishra की शिव महापुराण कथा में पहुंचे थे। उन्होंने मंच साझा किया, आशीर्वाद लिया और धार्मिक आयोजनों में खुलकर भागीदारी भी की थी। उस समय इन तस्वीरों और वीडियो को कांग्रेस समर्थकों ने खूब प्रचारित किया था।
इसी तरह मुख्यमंत्री बनने के बाद भूपेश बघेल Riteshwar Maharaj से मिलने भी पहुंचे थे। उस दौरान रितेश्वर महाराज ने उन्हें शराबबंदी और गरीबों के हित में काम करने की सलाह दी थी। भूपेश बघेल ने सार्वजनिक तौर पर उनका सम्मान भी किया था।
लेकिन समय के साथ कांग्रेस नेताओं के सुर बदलते दिखाई दिए। साल 2025 में भिलाई में आयोजित Dhirendra Krishna Shastri की कथा के दौरान बड़ा विवाद सामने आया। भूपेश बघेल ने उन पर अंधविश्वास फैलाने का आरोप लगाया था। इसके जवाब में धीरेंद्र शास्त्री ने मंच से कहा था कि अगर हिंदू समाज को जोड़ना अंधविश्वास है, तो ऐसे लोगों को देश छोड़ देना चाहिए। इसके बाद भूपेश बघेल ने पलटवार करते हुए उन्हें भाजपा का एजेंट तक बता दिया था।
दिलचस्प बात यह रही कि इससे पहले कांग्रेस नेता Vikas Upadhyay सार्वजनिक मंच से धीरेंद्र शास्त्री को “भगवान का स्वरूप” तक बता चुके थे। यही वजह है कि भाजपा अब कांग्रेस पर राजनीतिक सुविधा के हिसाब से संतों के प्रति रवैया बदलने का आरोप लगा रही है।
25 मई 2026 को मनेंद्रगढ़ पहुंचे चरणदास महंत ने मीडिया से बातचीत में कहा कि रामभद्राचार्य धर्म के नाम पर राजनीति करने आए हैं और वे भाजपा के प्रचारक हैं। उन्होंने यहां तक कह दिया कि वह उन्हें न जगद्गुरु मानते हैं और न गांव का गुरु। इस बयान के बाद विवाद और गहरा गया।
कोरबा सांसद Jyotsna Mahant ने भी कहा कि धर्म की आड़ में राजनीति नहीं होनी चाहिए और उनके लिए जनता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। हालांकि भाजपा ने इसे भी कांग्रेस की “सॉफ्ट हिंदुत्व बनाम राजनीतिक विरोध” की रणनीति करार दिया।
भाजपा सांसद Santosh Pandey ने चरणदास महंत के बयान को “सनातन विरोधी मानसिकता” बताया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेता तुष्टिकरण की राजनीति में संत समाज का अपमान कर रहे हैं। संतोष पांडेय ने राहुल गांधी, उदयनिधि स्टालिन और ममता बनर्जी जैसे नेताओं का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस अब सनातन विरोधी राजनीति की राह पर चल रही है।
भाजपा ने सवाल उठाया कि जब कांग्रेस नेता पहले संतों के मंचों पर जाकर आशीर्वाद लेते थे, तब वही संत सम्मानित थे, लेकिन अब राजनीतिक परिस्थितियां बदलते ही उन्हें भाजपा का एजेंट बताया जा रहा है। भाजपा का कहना है कि यह केवल राजनीतिक लाभ के लिए बदला गया रवैया है।
अब यह विवाद सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में धर्म, संत समाज और राजनीतिक दलों के रिश्तों पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और ज्यादा गरमा सकता है, क्योंकि भाजपा इसे सनातन सम्मान बनाम कांग्रेस मानसिकता के रूप में जनता के बीच ले जाने की तैयारी में दिखाई दे रही है।