Supreme Court of India ने CBSE की नई थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि इस नियम को लागू करने से पहले यह जांच जरूरी है कि कहीं इससे छात्रों और स्कूलों पर बेवजह का दबाव तो नहीं बढ़ रहा। खासतौर पर तब, जब देशभर में ट्रेंड टीचर्स और जरूरी किताबों की भारी कमी पहले से मौजूद है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि थ्री-लैंग्वेज रूल लागू करने में जमीनी स्तर पर आने वाली दिक्कतों को समझना बेहद जरूरी है। कोर्ट ने माना कि कई स्कूलों के पास पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं और कई भाषाओं की किताबें भी अभी उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में जल्दबाजी में नियम लागू करना छात्रों और स्कूलों दोनों के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।
कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार, Central Board of Secondary Education और National Council of Educational Research and Training को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 1 जुलाई को होगी। पहले सुनवाई 15 जून को तय की गई थी, लेकिन केंद्र सरकार की ओर से समय मांगने के बाद तारीख आगे बढ़ा दी गई।
दरअसल CBSE ने 15 मई को जारी सर्कुलर में 9वीं और 10वीं कक्षा के लिए थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी लागू करने का फैसला किया था। इसके तहत छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें कम-से-कम दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य होंगी। यह नियम नई शिक्षा नीति 2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क का हिस्सा बताया गया है।
हालांकि बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया कि इस साल 10वीं बोर्ड परीक्षा में तीसरी भाषा का अलग बोर्ड एग्जाम नहीं होगा। इसका मूल्यांकन स्कूल स्तर पर इंटरनल असेसमेंट के जरिए किया जाएगा। लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अगर छात्र तीसरी भाषा में पास नहीं हुआ, तो उसे 10वीं का सर्टिफिकेट नहीं मिलेगा। इसी बात को लेकर विवाद और बढ़ गया है।
इस पॉलिसी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों ने कई गंभीर सवाल उठाए हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि CBSE खुद पहले मान चुका था कि प्रशिक्षित भाषा शिक्षकों और टेक्स्टबुक्स की कमी है, फिर भी स्कूलों पर इसे लागू करने का दबाव बनाया जा रहा है। उनका आरोप है कि यह फैसला मनमाना है और नई शिक्षा नीति की उस भावना के खिलाफ है, जिसमें कहा गया था कि किसी भी छात्र या राज्य पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी।
याचिका में यह भी कहा गया कि अचानक नई भाषा जोड़ने से करीब 50 लाख छात्रों पर अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव पड़ेगा। खासतौर पर ग्रामीण और छोटे स्कूलों में संसाधनों की कमी सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है। कई स्कूलों के पास अभी तक नई भाषा पढ़ाने के लिए शिक्षक तक उपलब्ध नहीं हैं।
CBSE ने इस समस्या को स्वीकार करते हुए स्कूलों को हाइब्रिड टीचिंग, रिटायर्ड टीचर्स की मदद और दूसरे स्कूलों से संसाधन साझा करने जैसे विकल्प सुझाए हैं। बोर्ड और NCERT फिलहाल 19 भारतीय भाषाओं में नई किताबें तैयार करने में जुटे हुए हैं।
गौरतलब है कि नई शिक्षा नीति 2020 को देश में 34 साल बाद बड़े बदलाव के तौर पर लागू किया गया था। इसका मकसद छात्रों को बहुभाषी और स्किल-बेस्ड शिक्षा देना बताया गया था। लेकिन अब थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर शुरू हुआ विवाद शिक्षा व्यवस्था, संसाधनों और छात्रों पर बढ़ते दबाव को लेकर नए सवाल खड़े कर रहा है।
अब सभी की नजर 1 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला लाखों छात्रों, अभिभावकों और स्कूलों के भविष्य पर सीधा असर डाल सकता है।