खेती की बढ़ती लागत, मिट्टी की कम होती ताकत और रासायनिक खादों के ज्यादा इस्तेमाल से होने वाली समस्याओं के बीच अब नैनो यूरिया और नैनो डीएपी किसानों के लिए एक अच्छा और लोकप्रिय विकल्प बनते जा रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर किसान इन्हें सही मात्रा और वैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल करें, तो खेती की लागत कम हो सकती है, उत्पादन बढ़ सकता है और मिट्टी की सेहत भी ठीक रह सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में खेती को लंबे समय तक फायदेमंद और टिकाऊ बनाने के लिए खाद के इस्तेमाल के तरीकों में बदलाव जरूरी होगा। इसी वजह से किसानों में नैनो उर्वरकों को लेकर रुचि लगातार बढ़ रही है।
पारंपरिक उर्वरकों पर प्रति एकड़ 2200 रुपए तक खर्च
छत्तीसगढ़ सहित देश के अधिकांश धान उत्पादक क्षेत्रों में सामान्यतः प्रति एकड़ 2 से 3 बोरी यूरिया और 1 बोरी डीएपी का उपयोग किया जाता है।
मौजूदा कीमतों के अनुसार एक बोरी यूरिया की कीमत लगभग 270 रुपए और एक बोरी डीएपी की कीमत लगभग 1350 रुपए है। इस प्रकार केवल यूरिया और डीएपी पर प्रति एकड़ करीब 1900 से 2200 रुपए तक का खर्च हो जाता है।
नैनो यूरिया से खाद लागत में बचत
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, 500 मिलीलीटर नैनो यूरिया की एक बोतल का प्रभाव लगभग एक बोरी पारंपरिक यूरिया के बराबर माना जाता है। फसल में दो चरणों में छिड़काव के जरिए पारंपरिक यूरिया की जरूरत को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
यदि किसान 2 बोरी ठोस यूरिया की जगह 2 बोतल नैनो यूरिया का उपयोग करते हैं तो प्रति एकड़ लगभग 100 रुपए तक की बचत संभव है। दो बोरी पारंपरिक यूरिया की कीमत करीब 540 रुपए होती है, जबकि 2 बोतल नैनो यूरिया लगभग 450 से 500 रुपये में उपलब्ध हो जाता है। इससे खाद लागत के साथ-साथ परिवहन, भंडारण और मजदूरी खर्च में भी कमी आती है।
नैनो डीएपी के उपयोग से भी हो सकती है बचत
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि 50 किलो डीएपी की पूरी मात्रा उपयोग करने के बजाय यदि किसान 25 किलो डीएपी के साथ 500 मिलीलीटर नैनो डीएपी का उपयोग करें तो प्रति एकड़ लगभग 75 से 150 रुपए तक की बचत हो सकती है।
पौधों को मिलता है बेहतर और संतुलित पोषण
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, पारंपरिक यूरिया का बड़ा हिस्सा मिट्टी, पानी और वातावरण में नष्ट हो जाता है। इसके विपरीत नैनो यूरिया के सूक्ष्म कण पौधों में तेजी से अवशोषित हो जाते हैं। इससे पौधों को संतुलित पोषण मिलता है और पोषक तत्वों की उपयोग दक्षता बढ़ती है।
उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार के संकेत
विशेषज्ञों के मुताबिक संतुलित उपयोग की स्थिति में नैनो उर्वरकों के कई सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। इनमें फसल की बढ़वार बेहतर होना, पौधों की हरियाली लंबे समय तक बने रहनादानों का भराव मजबूत होना, उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार, उर्वरकों की उपयोग दक्षता बढ़ना शामिल हैं। कई कृषि परीक्षणों में 5 से 8 प्रतिशत तक उत्पादन वृद्धि के संकेत भी मिले हैं।
मिट्टी और पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद
कृषि क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि लगातार अधिक मात्रा में रासायनिक खादों के उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है। नैनो उर्वरकों का संतुलित उपयोग मिट्टी में पोषक तत्वों के संतुलन को बनाए रखने में मदद कर सकता है।
इसके अलावा रासायनिक अवशेष कम होते हैं। भूजल प्रदूषण घटता है। मिट्टी की जैविक सक्रियता बेहतर बनी रहती है। पर्यावरणीय प्रभाव कम होता है इसी कारण वैज्ञानिक खेती में संतुलित उर्वरक उपयोग पर अधिक जोर दिया जा रहा है।
आयात पर निर्भरता घटाने में मिल सकती है मदद
वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसान संतुलित रूप से नैनो उर्वरकों का उपयोग बढ़ाते हैं तो आयातित उर्वरकों पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी, देश के उर्वरक उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, उत्पादन इकाइयों में रोजगार बढ़ेगा और कृषि क्षेत्र आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
रायपुर में यूरिया और डीएपी का पर्याप्त भंडारण
कृषि विभाग के अनुसार प्रदेश में पारंपरिक उर्वरकों का पर्याप्त भंडारण उपलब्ध है और किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है।
रायपुर जिले की समितियों में वर्तमान में यूरिया की उपलब्धता 9,102 मीट्रिक टन है, जबकि कुल भंडारित यूरिया की मात्रा 10,732 मीट्रिक टन है। इसी प्रकार डीएपी की उपलब्धता 3,092 मीट्रिक टन तथा कुल भंडारित डीएपी की मात्रा 3,927 मीट्रिक टन है।
इसके साथ ही कृषि सेवा केंद्रों और समितियों के माध्यम से नैनो यूरिया तथा नैनो डीएपी की उपलब्धता भी बढ़ाई जा रही है, ताकि किसान आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर इन विकल्पों का इस्तेमाल कर सकें।
आधुनिक खेती की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में वैज्ञानिक खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग और आधुनिक तकनीकों का समन्वय ही खेती को अधिक लाभकारी बनाएगा। नैनो यूरिया और नैनो डीएपी को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी विकल्प माना जा रहा है, जो कम लागत, बेहतर उत्पादन और मिट्टी की सुरक्षा तीनों मोर्चों पर किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।