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भारत का ‘गोल्डीलॉक्स मोमेंट’ पड़ रहा कमजोर? RBI ने घटाया GDP अनुमान, बढ़ाई महंगाई की आशंका

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भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए पिछले कुछ वर्षों से जिस ‘गोल्डीलॉक्स मोमेंट’ की चर्चा हो रही थी, अब उसके कमजोर पड़ने के संकेत दिखाई देने लगे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की जून मौद्रिक नीति समीक्षा ने स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक चुनौतियों और बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच भारत को अब आर्थिक मोर्चे पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि केंद्रीय बैंक का मानना है कि देश की मजबूत घरेलू आर्थिक बुनियाद इन चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है।

अर्थशास्त्र में ‘गोल्डीलॉक्स मोमेंट’ उस स्थिति को कहा जाता है जब आर्थिक विकास मजबूत हो, महंगाई नियंत्रित रहे और वित्तीय स्थिरता बनी रहे। पिछले एक वर्ष के दौरान भारत इसी अनुकूल स्थिति का लाभ उठा रहा था। मजबूत विकास दर, नियंत्रित महंगाई और निवेश गतिविधियों में तेजी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रखा था।

लेकिन अब हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं। RBI ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर का अनुमान 6.9 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है। वहीं खुदरा महंगाई (CPI) का अनुमान 4.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया गया है। यह संकेत देता है कि आने वाले समय में आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार कुछ धीमी हो सकती है, जबकि महंगाई का दबाव बढ़ सकता है।

विशेषज्ञ इस स्थिति को ‘गोल्डीलॉक्स रिवर्सल’ कह रहे हैं, यानी वह दौर जब विकास और महंगाई के बीच बना संतुलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है। RBI के अनुसार इसके पीछे कई वैश्विक कारण जिम्मेदार हैं। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता और मौसम से जुड़े जोखिम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं।

कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का असर सीधे परिवहन, उत्पादन और ऊर्जा लागत पर पड़ता है। इससे महंगाई बढ़ने की संभावना रहती है। वहीं यदि मानसून सामान्य नहीं रहता या मौसम संबंधी जोखिम बढ़ते हैं तो खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी दबाव बन सकता है, जिसका असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा।

हालांकि RBI का रुख पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि भारत की घरेलू मांग, निजी खपत और निवेश गतिविधियां अभी भी मजबूत बनी हुई हैं। यही कारण है कि विकास दर में कटौती के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण बरकरार रखा गया है।

पिछले वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.6 प्रतिशत की प्रभावशाली वृद्धि दर्ज की थी। इस विकास में निजी उपभोग, पूंजीगत निवेश, विनिर्माण क्षेत्र और सेवा क्षेत्र की बड़ी भूमिका रही थी। साथ ही महंगाई भी काफी हद तक नियंत्रण में रही थी। मार्च में खुदरा महंगाई 3.4 प्रतिशत और अप्रैल में 3.5 प्रतिशत दर्ज की गई थी, जो RBI के 4 प्रतिशत लक्ष्य से भी कम थी।

यही वजह है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की आर्थिक स्थिति अभी भी कई अन्य देशों की तुलना में बेहतर है। मजबूत बैंकिंग व्यवस्था, बढ़ता निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार और बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्च अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रहे हैं।

फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती वैश्विक परिस्थितियों से पैदा हो रहे दबावों को संतुलित करना है। यदि तेल कीमतों में और वृद्धि होती है या वैश्विक तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका असर भारत की विकास दर और महंगाई दोनों पर पड़ सकता है। वहीं यदि घरेलू मांग मजबूत बनी रहती है और निवेश गतिविधियां जारी रहती हैं, तो भारत इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकता है।

कुल मिलाकर RBI का ताजा आकलन यह संकेत देता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का ‘गोल्डीलॉक्स मोमेंट’ भले ही पहले जितना मजबूत न रहा हो, लेकिन देश की आर्थिक नींव अभी भी मजबूत है। आने वाले महीनों में वैश्विक घटनाक्रम, मानसून और ऊर्जा कीमतें यह तय करेंगी कि भारत अपनी विकास यात्रा को किस गति से आगे बढ़ाता है।

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