छत्तीसगढ़ में 15 साल में 30 लाख से ज्यादा लोगों की खून-पसीने की कमाई चिटफंड कंपनियों ने डकार ली। आंकड़े के मुताबिक प्रदेशभर के निवेशकों के 2000 करोड़ रुपए से ज्यादा डूबे हैं, पर तमाम कोशिशों के बाद अब तक 5.16 लाख लोगों को ही 98 करोड़ रुपए ही वापस मिल सके। यानी महज 5% हिस्सा। इस कछुआ रफ्तार की सबसे बड़ी वजह यह है कि चिटफंड कंपनियों की प्रॉपर्टी या तो अटैच नहीं हो पा रही है, या जो अटैच हुई उसकी नीलामी अटक गई है। कंपनियों की 200 करोड़ से ज्यादा की प्रॉपर्टी पर जिला अदालत, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से ‘स्टे’ लगा हुआ है। प्रॉपर्टी नहीं बिक पाने से पिछले दो साल से पीड़ितों की रकम वापसी ठप है।
अब इस गतिरोध को तोड़ने के लिए राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण याचिका दायर करने जा रही है। इसमें प्रदेशभर में मौजूद चिटफंड कंपनियों की प्रॉपर्टी की बिक्री का रास्ता साफ करने और सभी तरह के ‘स्टे’ हटाने की मांग की जाएगी।
करीब 15 साल पहले हर जिले में 7000 से ज्यादा छोटी-बड़ी फर्जी कंपनियां आई थीं। रायपुर में ही 66 कंपनियों में 800 करोड़ से ज्यादा का निवेश हुआ और सभी रातों-रात भाग गईं। 2018 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने नया अधिनियम बनाकर निवेशकों का पूरा पैसा लौटाना सुनिश्चित करने का दावा किया था, पर 98 करोड़ रुपए ही लौटे। इसके बाद भाजपा सरकार बनी, पर पीड़ितों को रकम वापसी का काम बंद है।
2002 में पहली एफआईआर हुई, किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया 2002 में रायपुर के डीडी नगर में एक चिटफंड कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। लेकिन तब प्रशासन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। नतीजा यह हुआ कि अगले 5 साल में पूरे राज्य में चिटफंड कंपनियों का जाल बिछ गया।
अभी राज्यभर में 220 से ज्यादा अनियमित चिटफंड कंपनियों के खिलाफ करीब 490 एफआईआर दर्ज हैं। इनमें से 265 मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं, जबकि 80 कंपनियों के 66 से ज्यादा डायरेक्टरों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है, लेकिन रकम वापसी का तंत्र अब भी नाकाम है।
दर्द: किसी ने लोन लिया, कोई पाई-पाई जोड़ बना रहा मकान
बेटे के कारोबार के लिए बैंक से लिया लोन
नवा रायपुर के रहने वाले लक्ष्मीनारायण चंद्राकर ने पीएसीएल और एचबीएन कंपनी में 5 लाख रुपए से ज्यादा का निवेश किया था। पूरी रकम डूब गई। बाद में उन्हें अपने बेटे का नया कारोबार शुरू कराने के लिए बैंक से लोन लेना पड़ा।
घर बनाने का सपना टूटा, कई साल खिंच गया काम
नरदहा के कृष्णकांत साहू ने मकान बनाने के लिए पाई-पाई बचाकर पीएसीएल में 10 लाख से ज्यादा जमा कराए थे। कंपनी बंद होने से रकम डूब गई। अब वे पिछले कई साल से धीरे-धीरे (टुकड़ों में) मकान का काम करा पा रहे हैं।
इन कंपनियों की प्रॉपर्टी की जानकारी, लेकिन कुर्क ही नहीं हुई
सनशाइन इंफ्रा बिल्ड- 50 लाख की संपत्ति, भाटापारा के गांव में कंपनी के डायरेक्टर के नाम पर 20 एकड़ जमीन। पीएसीएल- 110 करोड़ की संपत्ति, कृष्णा कांप्लेक्स में 1.50 करोड़ का ऑफिस। धमतरी, मनेंद्रगढ़, रायगढ़ में जमीन। एचबीएन- 100 करोड़ संपत्ति, रायपुरा चौक पर अधूरा शॉपिंग मॉल 60 लाख का। धमतरी और गरियाबंद में जमीन। बीएनपी इंडिया- 46 करोड़ की संपत्ति: अभनपुर के पास 30 एकड़ जमीन। राज्य के दूसरे शहरों में भी जमीन में निवेश। आस्था गोट फार्मिंग- 120 करोड़ की संपत्ति, खरोरा के पास 15 एकड़ जमीन। कुछ और कस्बों में भी प्लाट के मालिक। माइक्रो फाइनेंस- 80 करोड़ की संपत्ति, पुराना धमतरी रोड में 40 एकड़ जमीन। कुछ और कस्बों में भी प्लॉट मौजूद। ग्रीन रे कंपनी- 70 करोड़ की संपत्ति, ओडिशा में कंपनी ने जमीन पर निवेश किया, इसे कुर्क किया नीलामी नहीं हुई।
सभी मामलों की सुनवाई एक ही जगह होने से राहत मिलेगी
राज्यभर में अभी अलग-अलग कोर्ट में चिटफंड कंपनियों के मामले चल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में सरकार जाती है तो सभी मामलों को एक ही कोर्ट में सुनने का आदेश मिल सकता है। इससे सरकार का पक्ष मजबूत होगा। सभी मामलों की सुनवाई एक ही जगह पर होने से संपत्ति कुर्क और नीलामी करने का आदेश भी कोर्ट से जल्दी जारी हो सकता है।
अभी अलग-अलग तारीख और दस्तावेजों को लेकर काफी उलझन है। सरकार के खाते में रकम वापस आती है तो जिन लोगों ने पहले आवेदन जमा किया है उनके खाते में सीधे रकम जमा कराई जा सकती है। इससे लाखों लोगों को बड़ी राहत मिलेगी।
पुरानी एफआईआर के आधार पर चिटफंड कंपनियों की संपत्तियों की पूरी जानकारी एक साथ राज्य सरकार को दी जा चुकी है। जिन संपत्तियों पर कोर्ट स्टे है, उसे हटाने भी नियमानुसार कदम उठाए जा रहे हैं।” -दौलत राम पोर्ते, नोडल अधिकारी (चिटफंड), पुलिस कमिश्नर