रायपुर – गांजा इस समय तस्करों का पसंदीदा माल बन गया है। वजह… क्योंकि ओड़िशा और आंध्र प्रदेश से खरीदते वक्त 3000 से 5000 हजार रुपए किलो तक कीमत होती है। वह शहर और गांव की गलियों में पहुंचते-पहुंचते एक लाख रुपए तक हो जाता है। मतलब तीस गुना तक मुनाफा।
उल्लेखनीय है कि, ओडिशा से दूसरे राज्यों में होने वाली गांजा तस्करी का प्रमुख रूट छत्तीसगढ़ का सरहदी इलाका है। नौ जिले ओडिशा सीमा से लगे हुए हैं। तस्कर ओडिशा से गांजा तस्करी कर दूसरे प्रांतों में ले जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक छत्तीसगढ़ के जरिए हर साल 500 से 488 सौ क्विंटल गांजा की तस्करी होती है। जितनी मात्रा में तस्करी होती है, उसमें से महज 18 से 22 प्रतिशत गांजा पकड़ा जाता है। ओडिशा का गांजा छत्तीसगढ़ के रास्ते देश के अलग-अलग 17 राज्यों तक पहुंच रहा है।
दलाल दूसरे राज्य से आए तस्कर से गांजे का सौदा कर कीमत तय करता है
गांजा तस्करी करने ओडिशा में किसी भी प्रकार से कोई सिंडिकेट काम नहीं करता। ओडिशा में गांजा तस्करी कराने में लिप्त दलाल देश के अलग-अलग राज्यों के तस्करों से संपर्क कर उन्हें अपने क्षेत्र में गांजा की पैदावार की जानकारी देकर सौदा करने बुलाते हैं। इसके बाद दलाल दूसरे राज्य से आए तस्कर से गांजे का सौदा कर कीमत तय करता है। इसमें दलाल द्वारा गांजा की पैकेट बनाने से लेकर गाड़ी में लोड करने तक की कीमत शामिल रहता है।
ज्यादा कमाई की लालच में तस्करी
गांजा तस्करी करना जितना रिस्क है, कमाई उससे कई गुना ज्यादा है। इसलिए स्थानीय के साथ दूसरे राज्य के तस्कर कमाई की लालच में रिस्क उठाकर गांजा तस्करी करते हैं। ओडिशा में एक किलो गांजा की कीमत तीन से पांच हजार रुपए किलो बिकता है। वहीं गांजा स्थानीय स्तर पर 50 हजार रुपए से एक लाख रुपए किलो पर बिकता है। स्थानीय तस्कर गांजा तस्कर अपने गुर्गों (कोचिया) की मदद से गांजा का 10 से 20 ग्राम का पैकेट बनाकर बेचते हैं। 10 ग्राम का पैकेट 50 से 100 रुपए पैकेट में बेचते हैं। 20 ग्राम का पैकेट 100 से 200 रुपए में बेचते हैं। वहीं पब, क्लब और कालेज के आसपास के इलाकों या पॉश कालोनियों में पुड़िया की कीमत 500 रुपए तक हो जाती है।
सख्ती का असर पकड़े जा रहे हैं गांजा तस्कर
रायपुर पुलिस कमिश्नर डॉ. संजीव शुक्ला ने कहा कि रायपुर में जो गांजा पहुंच रहा है वह महासमुंद के रास्ते बस या छोटी वाहनों में लाकर खपा रहे हैं। पुलिस हर संदिग्ध गाड़ियों की जांच करने के साथ जिस रास्ते से गांजा तस्करी होती है, उन मार्गों में चलने वाली यात्री बसों की जांच कर रही है। जांच के कारण ही रायपुर में लगातार गांजा तस्कर पकड़े जा रहे हैं। रायपुर में धमतरी, बस्तर के रास्ते तस्कर गांजा दुर्ग, राजनांगदगांव पहुंचा रहे हैं। इसी तरह से सारंगढ़-बिलाईगढ़ रूट से जो गांजा तस्करी हो रही है, वह बिलासपुर के साथ पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों में पहुंच रहा है।
एमपी, यूपी, राजस्थान, दिल्ली हरियाणा से पश्चिम बंगाल तक पहुंचता है
ओडिशा से अन्य राज्यों के लिए जो गांजा तस्करी होती है उनमें मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे 17 राज्ञ्ज शामिल हैं। तस्कर गांजा तस्करी करने एम्बुलेंस, डाक गाड़ियां या डॉक्टर लिखी लग्जरी कारों तक पहुंचता है।
पब कल्चर में कीमत ज्यादा
लोकल स्तर पर गांजा तस्करी से तस्कर प्रति किलो 50 हजार से एक लाख रुपए बना सकते हैं। यहीं गांजा महानगरों में तथा छत्तीसगढ़ के छोड़ अन्य प्रांतों में पहुंचता है तो कीमत कई गुना और बढ़ जाती है। मुंबई, दिल्ली, इंदौर जैसे महानगरों में दो से तीन ग्राम की पुड़िया बनाकर गांजा की कीमत प्रति पुड़िया 500 रुपए तक वसूलते हैं।
जशपुर- सुंदरगढ़ (एंट्री पॉइंट)
ओड़िशा का सुंदरगढ़ जिला छत्तीसगढ़ के जशपुर की सीमा को छूता है। वनांचल और ग्रामीण रास्तों का फायदा उठाकर तस्कर इस मार्ग से झारखंड और बिहार की ओर माल डाइवर्ट करते हैं।
रायगढ़- सुंदर गढ़, झारसुगुड़ा (रेंगाली हब)
यह रूट तस्करों का पुराना और सबसे पसंदीदा रास्ता है। इस मार्ग पर आने वाला ‘कनकतोरा बॉर्डर’ और ओड़िशा का ‘रेंगाली हब तस्करी के लिहाज से बेहद संवेदनशील जोन बन चुके हैं, जहां से माल सीधे नेशनल हाईवे पर चढ़ाया जाता है।
सारंगढ़- बिलाईगढ़-बरगढ़ (सराईपाली बेल्ट)
नए जिले सारंगढ़-बिलाईगढ़ से सटा ओड़िशा का बरगढ़ रूट अंतरराज्यीय तस्करों के लिए मुफीद है। यहां का सराईपाली-बरगढ़ बेल्ट घने और लिंक रोड्स से जुड़ा होने के कारण पुलिस के लिए हमेशा बड़ी चुनौती रहता है।
महासमुंद- बरगढ़, नुआपाड़ा (सिंघोड़ा बॉर्डर)
यह छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा और सबसे संवेदनशील गांजा कॉरिडोर माना जाता है। महासमुंद का ‘सिंघोड़ा बॉर्डर’ और बसना का पूरा इलाका सीधे ओड़िशा के बरगढ़ और नुआपाड़ा से जुड़ा है। राज्य में गांजे की सबसे बड़ी और रिकॉर्डतोड़ जब्तियां इसी सिंघोड़ा नेशनल हाईवे पर नाकेबंदी के दौरान होती हैं।
गरियाबंद धमतरी- नुआपाड़ा (देवभोग इलाका)
गरियाबंद जिले का ‘देवभोग इलाका’ भौगोलिक रूप से ओड़िशा के नुआपाड़ा और नबरंगपुर की सीमाओं को आपस में जोड़ता है। इस रूट का उपयोग तस्कर तब करते हैं जब मुख्य राजमार्गों पर पुलिस की चेकिंग बहुत ज्यादा सख्त होती है।
कोण्डागांव नबरंगपुर (बस्तर का सेफ पैसेज)
ओड़िशा के नबरंगपुर से माल निकालकर कोण्डागांव के अंदरूनी रास्तों के जरिए रायपुर रेंज की सीमा में प्रवेश करने का यह एक समानांतर रूट है। बस्तर नबरंगपुर, कोरापुट (दरभा घाटी का जाल): बस्तर जिला सीधे ओड़िशा के कोरापुट बेल्ट में खुलता है। जगदलपुर और दरभा घाटी का दुर्गम रास्ता तस्करों को घने जंगलों के बीच से गांजा परिवहन करने की भौगोलिक सहूलियत देता है।
सुकमा – कोरापुट, मलकानगिरी (सबसे संवेदनशील कॉरिडोर)
यह पूरे बस्तर संभाग का सबसे खतरनाक और संवेदनशील रूट है। आंध्र प्रदेश और ओड़िशा का कुख्यात ‘मलकानगिरी बॉर्डर’ सीधे सुकमा और बस्तर के घने अंदरूनी रास्तों से जुड़ता है। लाल कॉरिडोर (नक्सल प्रभावित क्षेत्र) होने के कारण यहां सुरक्षा एजेंसियों की हर हलचल पर तस्करों के लोकल नेटवर्क की पैनी नजर रहती है।