हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार और प्रशासनिक कसावट लाने के उद्देश्य से एक बड़ा फैसला लिया है। राज्य सरकार ने प्रदेश के उन 10 सरकारी डिग्री कॉलेजों को बंद कर नजदीकी बड़े कॉलेजों में मर्ज करने का निर्णय लिया है, जहां विद्यार्थियों की कुल संख्या 75 से भी कम रह गई थी।
उच्च शिक्षा विभाग के निदेशक डॉ. हरीश कुमार की ओर से इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी गई है। सरकार का तर्क है कि यह कदम राज्य के वित्तीय और शैक्षणिक संसाधनों के बेहतर उपयोग और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के उद्देश्य से उठाया गया है।
नए दाखिले पूरी तरह बंद, इन 10 कॉलेजों पर गिरी गाज
शिक्षा विभाग की ओर से जारी आदेश के अनुसार, चिन्हित 10 कॉलेजों में किसी भी कक्षा या प्रथम वर्ष के लिए नए दाखिले नहीं किए जाएंगे। संबंधित कॉलेजों के प्राचार्यों को इस संबंध में सख्त निर्देश दे दिए गए हैं। बंद होने वाले संस्थानों की सूची में टिक्कर, भलेई, कुकमसेरी, कुपवी, संधोल, मुल्थान, जैनगर, ननखड़ी, रोनहाट और कोटली डिग्री कॉलेज शामिल हैं।
इस फैसले का सबसे बड़ा असर लाहुल-स्पीति जिले के कुकमसेरी कॉलेज के विद्यार्थियों पर पड़ सकता है, क्योंकि इस संस्थान के बंद होने के बाद अब स्थानीय छात्रों को आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए पहाड़ों को पार कर कुल्लू जाना पड़ेगा।
छात्रों को मिलेगा 5,000 रुपये मासिक स्टाइपेंड
कॉलेजों के बंद होने से इन संस्थानों में पहले से पढ़ रहे दूसरे और तीसरे वर्ष के छात्रों के सामने पढ़ाई बीच में छूटने और आर्थिक बोझ बढ़ने का बड़ा संकट खड़ा हो गया था। छात्रों को अपने घरों के निकट स्थित कॉलेज छोड़कर अब जिला मुख्यालयों या दूरदराज के बड़े कॉलेजों का रुख करना होगा, जिससे उनके आवास, परिवहन और अन्य दैनिक खर्चे बढ़ जाएंगे।
इसी अतिरिक्त वित्तीय भार को कम करने के लिए सुक्खू सरकार ने एक बड़ी राहत नीति की घोषणा की है। इसके तहत प्रभावित होने वाले प्रत्येक छात्र को पढ़ाई जारी रखने के लिए सरकार की ओर से हर महीने 5,000 रुपये का स्टाइपेंड दिया जाएगा। हालांकि, विभाग ने साफ किया है कि यह वित्तीय लाभ केवल उन्हीं कॉलेजों में दाखिला लेने पर मान्य होगा, जिनके साथ इन संस्थानों को मर्ज किया गया है।
बुनियादी ढांचे और करोड़ों की लागत पर खड़े हुए सवाल
सरकार के इस औचक फैसले के बाद राज्य में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर कई सवाल भी खड़े होने लगे हैं। दरअसल, इन दूरदराज के क्षेत्रों में कॉलेजों को खोलने के लिए पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा करोड़ों रुपये की लागत से आलीशान सरकारी भवनों और ढांचों का निर्माण कराया गया था। अब इन कॉलेजों के बंद होने के बाद इन खाली पड़े सरकारी भवनों के भविष्य और उनके सही रखरखाव को लेकर प्रशासनिक स्तर पर चिंता व्यक्त की जा रही है।
गौरतलब है कि राज्य सरकार ने बीते वर्ष ही यह निर्णय ले लिया था, लेकिन तब सत्र बीच में होने के कारण और कानूनी पेचीदगियों से बचने के लिए इसे टाल दिया गया था, जिसे अब नए सत्र की शुरुआत के साथ पूरी तरह लागू कर दिया गया है।